जिगर Poetry (page 10)

बरबाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा

साहिर लुधियानवी

सदियों की शब-ए-ग़म को सहर हम ने बनाया

साग़र निज़ामी

फिर रह-ए-इश्क़ वही ज़ाद-ए-सफ़र माँगे है

साग़र निज़ामी

हज़ार हम-सफ़रों में सफ़र अकेला है

साग़र मेहदी

तड़प के रात बसर की जो इक मुहिम सर की

सफ़ी लखनवी

फ़सील-ए-ज़ात में दर तो तिरी इनायत है

सईद नक़वी

पहले वो क़ैद-ए-मर्ग से मुझ को रिहा करे

सईद अख़्तर

जो लब पे न लाऊँ वही शे'रों में कहूँ मैं

सादिक़ नसीम

बना हुआ है मिरा शहर क़त्ल-गाह कोई

साबिर ज़फ़र

निगाह करने में लगता है क्या ज़माना कोई

साबिर ज़फ़र

जिधर हो ज़िंदगी मुश्किल उधर नहीं आते

साबिर ज़फ़र

नग़्मा-ज़न है नज़र-ए-बे-आवाज़

सबा नक़वी

जो देखिए तो करम इश्क़ पर ज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

वफ़ा का बंदा हूँ उल्फ़त का पासदार हूँ मैं

साइल देहलवी

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर वाले

साइल देहलवी

बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में

साइल देहलवी

कैसे करूँ मैं ज़ब्त-ए-राज़ तू ही मुझे बता कि यूँ

एस ए मेहदी

तुझ बिन रह-ए-हयात में लुत्फ़-ए-सफ़र कहाँ

रोहित सोनी ‘ताबिश’

गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बे-ख़बर न था

रोहित सोनी ‘ताबिश’

ज़रूर पाँव में अपने हिना वो मल के चले

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

ये कहाँ लगी ये कहाँ लगी जो क़फ़स से शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठा

रियाज़ ख़ैराबादी

ले गया घर से उन्हें ग़ैर के घर का ता'वीज़

रियाज़ ख़ैराबादी

ख़्वाब में भी नज़र आ जाए जो घर की सूरत

रियाज़ ख़ैराबादी

जाने वाले न हम उस कूचे में आने वाले

रियाज़ ख़ैराबादी

दुनिया से अलग हम ने मयख़ाने का दर देखा

रियाज़ ख़ैराबादी

न अंगिया न कुर्ती है जानी तुम्हारी

रिन्द लखनवी

मुझ बला-नोश को तलछट भी है काफ़ी साक़ी

रिन्द लखनवी

ख़ामोश दाब-ए-इश्क़ को बुलबुल लिए हुए

रिन्द लखनवी

गले लगाएँ बलाएँ लें तुम को प्यार करें

रिन्द लखनवी

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