जिगर Poetry (page 6)

न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से

ज़ौक़

न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता

ज़ौक़

कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे

ज़ौक़

हाथ सीने पे मिरे रख के किधर देखते हो

ज़ौक़

गुहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैं

ज़ौक़

इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ

ज़ौक़

कौन दुनिया से बादा-ख़्वार उठा

शैख़ अली बख़्श बीमार

ये काएनात तिरा मोजज़ा लगे है मुझे

शहज़ाद रज़ा लम्स

कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

कम-फ़हम हैं तो कम हैं परेशानियों में हम

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है

शायान क़ुरैशी

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

बिखरी थी हर सम्त जवानी रात घनेरी होने तक

शायान क़ुरैशी

वो ले के दिल को ये सोची कहीं जिगर भी है

शौक़ क़िदवाई

फैमली-प्लैनिंग

शौकत थानवी

शिद्दत-ए-दर्द-ए-जिगर हो ये ज़रूरी तो नहीं

शातिर हकीमी

दिखाई देंगे जो गुल मेज़ पर क़रीने से

शारिक़ जमाल

दिल में मिरे जिगर में मिरे आँख में मिरी

शरफ़ मुजद्दिदी

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

कौन है दर्द-आश्ना संग-दिली का दौर है

शमीम करहानी

दर्द-शनास दिल नहीं जल्वा-तलब नज़र नहीं

शमीम करहानी

अगरचे इश्क़ में इक बे-ख़ुदी सी रहती है

शमीम करहानी

आँखें ग़म-ए-फ़िराक़ से हैं तर इधर-उधर

शमीम फ़तेहपुरी

बे-नवा

शमीम अल्वी

कहाँ है आ जा

शकील बदायुनी

तस्वीर बनाता हूँ तिरी ख़ून-ए-जिगर से

शकील बदायुनी

करने दो अगर क़त्ताल-ए-जहाँ तलवार की बातें करते हैं

शकील बदायुनी

हुई हम से ये नादानी तिरी महफ़िल में आ बैठे

शकील बदायुनी

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