शरीर Poetry (page 40)

दो चराग़

अली सरदार जाफ़री

चाँद को रुख़्सत कर दो

अली सरदार जाफ़री

बम्बई

अली सरदार जाफ़री

बहुत क़रीब हो तुम

अली सरदार जाफ़री

ये क्या कि ख़ल्क़ को पूरा दिखाई देता हूँ

अली मुज़म्मिल

उलझन

अली इमरान

इतनी बार मोहब्बत करना कितना मुश्किल हो जाता है

अली इमरान

दिल में चलती हुई जंगों से निकल आऊँगा

अली इमरान

बोसीदा ख़दशात का मलबा दूर कहीं दफ़नाओ

अली अकबर अब्बास

रूह की बात सुने जिस्म के तेवर देखे

अली अब्बास उम्मीद

अजब सी कशमकश तमाम उम्र साथ साथ थी

अलीना इतरत

नज़्म तकमील

अलीना इतरत

मुझे तो इंतिज़ार-ए-इश्क़ में ही लुत्फ़ आता है

अलीना इतरत

आज फिर

अलीना इतरत

बगूला बन के नाचता हुआ ये तन गुज़र गया

अलीना इतरत

नाज़िल हुआ था शहर में काला अज़ाब एक

अलीम सबा नवेदी

मैं जिस का मुंतज़िर हूँ वो मंज़र पुकार ले

अलीम सबा नवेदी

सदाएँ जिस्म की दीवार पार करती हैं

अलीम अफ़सर

न पूछ रब्त है क्या उस की दास्ताँ से मुझे

अलीम अफ़सर

करना पड़ा था जिस के लिए ये सफ़र मुझे

अलीम अफ़सर

चले थे भर के रेत जब सफ़र की जिस्म-ओ-जाँ में हम

अलीम अफ़सर

बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग

अलीम अफ़सर

मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे

आलमताब तिश्ना

असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना

आलमताब तिश्ना

उर्दू

आलम मुज़फ्फ़र नगरी

तहज़ीब की ज़ंजीर से उलझा रहा मैं भी

आलम ख़ुर्शीद

जाना तो बहुत दूर है महताब से आगे

आलम ख़ुर्शीद

कुछ फ़ासला नहीं है अदू और शिकस्त में

अकरम नक़्क़ाश

हब्स-ए-दरूँ पे जिस्म-ए-गिराँ-बार संग था

अकरम नक़्क़ाश

कोई हुनर तो मिरी चश्म-ए-अश्क-बार में है

अकरम महमूद

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