शरीर Poetry (page 38)

तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर

अनवर सदीद

घुप-अँधेरे में भी उस का जिस्म था चाँदी का शहर

अनवर सदीद

उस की अना के बुत को बड़ा कर के देखते

अनवर सदीद

तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर

अनवर सदीद

आरज़ू ने जिस की पोरों तक था सहलाया मुझे

अनवर सदीद

मख़मली ख़्वाब का आँखों में न मंज़र फैला

अनवर मीनाई

जब ज़मीं के मुक़द्दर सँवर जाएँगे

अनवर मीनाई

एहसास की रगों में उतरने लगा है वो

अनवर मीनाई

शिकवा-ए-गर्दिश-ए-हालात लिए फिरता है

अनवर मसूद

आग

अनवर मक़सूद ज़ाहिदी

उदासी एक लड़की है

अनवार फ़ितरत

उदासी एक लड़की है

अनवार फ़ितरत

केंचुली बदलती रात

अनवार फ़ितरत

मोहब्बत हो तो बर्क़-ए-जिस्म-ओ-जाँ हो

अनवर देहलवी

दिल यही सोच के बेताब हुआ जाता है

अनुभव गुप्ता

क्या ख़बर थी कि तिरे साथ ये दुनिया होगी

अंजुम सिद्दीक़ी

दिमाग़ उन के तजस्सुस में जिस्म घर में रहा

अंजुम सिद्दीक़ी

काश

अंजुम सलीमी

एक महबूस नज़्म

अंजुम सलीमी

दिन ले के जाऊँ साथ उसे शाम कर के आऊँ

अंजुम सलीमी

बस एक जिस्म एक ही क़द में पड़ा रहूँ

अंजुम सलीमी

आईना साफ़ था धुँदला हुआ रहता था मैं

अंजुम सलीमी

है जो तासीर सी फ़ुग़ाँ में अभी

अंजुम रूमानी

मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा

अंजुम ख़लीक़

जब तक फ़सील-ए-जिस्म का दर खुल न जाएगा

अंजुम ख़लीक़

ब-फ़ैज़-ए-आगही ये क्या अज़ाब देख लिया

अंजुम ख़लीक़

ये रात ढलते ढलते रख गई जवाब के लिए

अंजुम इरफ़ानी

इतनी सारी शामों में एक शाम कर लेना

अंजुम इरफ़ानी

फ़सील-ए-जिस्म पे शब-ख़ूँ शरारतें तेरी

अंजुम इरफ़ानी

एक नज़्म

अनीस नागी

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