जुस्तजू Poetry (page 5)

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया

शहज़ाद अहमद

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

शिकस्त

शहराम सर्मदी

किताब गुमराह कर रही है

शहराम सर्मदी

रह-ए-वफ़ा में रहे ये निशान-ए-ख़ातिर बस

शहराम सर्मदी

आज फिर रू-ब-रू करोगे तुम

शाहिद कमाल

दम अजनबी सदाओं का भरते हो साहिबो

शाहिद अहमद शोएब

एक सूरज को सुरख़-रू कर के

सगुफ़ता यासमीन

गुल-ए-ख़ुश-नुमा के लिबास में कि शुआ-ए-नूर में ढल के आ

शायर फतहपुरी

अभी तक उन के वही सितम हैं जफ़ा की ख़ू भी नहीं गई है

शबाब

मोहब्बत ख़ार-ए-दामन बन के रुस्वा हो गई आख़िर

शानुल हक़ हक़्क़ी

किसी को कुछ नहीं मिलता है आरज़ू के बग़ैर

सय्यद ज़िया अल्वी

नासेह को जेब सीने से फ़ुर्सत कभू न हो

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हमारे दिल में मचलेगी किसी की आरज़ू कब तक

सत्यपाल जाँबाज़

दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है

सरदार सोज़

बढ़ते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम अज़्म-ए-सफ़र को क्या करूँ

सालिक लखनवी

वो ख़ूँ बहा कि शहर का सदक़ा उतर गया

सलीम शाहिद

दर्द की ख़ुश्बू से सारा घर मोअ'त्तर हो गया

सलीम शाहिद

चमकती ओस की सूरत गुलों की आरज़ू होना

सलीम फ़िगार

उसे मैं तलाश कहाँ करूँ वो उरूज है मैं ज़वाल हूँ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तुझे मैं मिलूँ तो कहाँ मिलूँ मिरा तुझ से रब्त मुहाल है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मी-यौमिल-हिसाब

साजिदा ज़ैदी

दर्द-ए-दिल भी कभी लहू होगा

साहिर होशियारपुरी

हर रात का ख़्वाब

सहबा अख़्तर

जिसे लिख लिख के ख़ुद भी रो पड़ा हूँ

सहबा अख़्तर

हम क़त्ल कब हुए ये पता ही नहीं चला

सहर महमूद

एक नग़्मा इक तारा एक ग़ुंचा एक जाम

साग़र सिद्दीक़ी

ये हादसा है बता दे कोई ज़माने को

साग़र ख़य्यामी

यही नहीं कि फ़क़त तिरी जुस्तुजू भी मैं

सादिक़ नसीम

उदास उदास सर-ए-साग़र-ओ-सुबू भी मैं

सादिक़ नसीम

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