सपना Poetry (page 94)

ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

अख़्तर शीरानी

ज़मान-ए-हिज्र मिटे दौर-ए-वस्ल-ए-यार आए

अख़्तर शीरानी

यक़ीन-ए-वादा नहीं ताब-ए-इंतिज़ार नहीं

अख़्तर शीरानी

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

अख़्तर शीरानी

उन को बुलाएँ और वो न आएँ तो क्या करें

अख़्तर शीरानी

उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं

अख़्तर शीरानी

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से नींदों को बसा दे आ कर

अख़्तर शीरानी

हमारे हाथ में कब साग़र-ए-शराब नहीं

अख़्तर शीरानी

अगर वो अपने हसीन चेहरे को भूल कर बे-नक़ाब कर दे

अख़्तर शीरानी

आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या

अख़्तर शीरानी

समुंदर सब के सब पायाब से हैं

अख़तर शाहजहाँपुरी

ज़िंदगी क्या हुए वो अपने ज़माने वाले

अख़्तर सईद ख़ान

याद आएँ जो अय्याम-ए-बहाराँ तो किधर जाएँ

अख़्तर सईद ख़ान

तुम हो या छेड़ती है याद-ए-सहर कोई तो है

अख़्तर सईद ख़ान

सुन रहा हूँ बे-सदा नग़्मा जो मैं बा-चश्म-ए-तर

अख़्तर सईद ख़ान

सफ़र ही शर्त-ए-सफ़र है तो ख़त्म क्या होगा

अख़्तर सईद ख़ान

निगाहें मुंतज़िर हैं किस की दिल को जुस्तुजू क्या है

अख़्तर सईद ख़ान

नैरंगी-ए-नशात-ए-तमन्ना अजीब है

अख़्तर सईद ख़ान

मुद्दत से लापता है ख़ुदा जाने क्या हुआ

अख़्तर सईद ख़ान

लब-ए-सुकूत पे इक हर्फ़-ए-बे-नवा भी नहीं

अख़्तर सईद ख़ान

कैसे समझाऊँ नसीम-ए-सुब्ह तुझ को क्या हूँ मैं

अख़्तर सईद ख़ान

दिल की राहें ढूँडने जब हम चले

अख़्तर सईद ख़ान

तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे

अख़्तर रज़ा सलीमी

हम आए रोज़ नया ख़्वाब देखते हैं मगर

अख़्तर रज़ा सलीमी

वो भी क्या दिन थे क्या ज़माने थे

अख़्तर रज़ा सलीमी

तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे

अख़्तर रज़ा सलीमी

हमारे जिस्म अगर रौशनी में ढल जाएँ

अख़्तर रज़ा सलीमी

फ़ुरात-ए-चश्म में इक आग सी लगाता हुआ

अख़्तर रज़ा सलीमी

अंदेशे मुझे निगल रहे हैं

अख़्तर रज़ा सलीमी

ख़त-ए-राह-गुज़ार

अख़्तर पयामी

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