सपना Poetry (page 96)

दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से

अकबर हैदराबादी

बस इक तसलसुल-ए-तकरार-ए-क़ुर्ब-ओ-दूरी था

अकबर हैदराबादी

शरार-ए-संग जो इस शोर-ओ-शर से निकलेगा

अकबर हमीदी

तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है

अकबर इलाहाबादी

मिरी मिसाल तो ऐसी है जैसे ख़्वाब कोई

अजमल सिराज

हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे

अजमल सिराज

गुज़र गई है अभी साअत-ए-गुज़िश्ता भी

अजमल सिराज

बुझ गया रात वो सितारा भी

अजमल सिराज

रास्ते के पेच-ओ-ख़म क्या शय हैं सोचा ही नहीं

अजमल अजमली

इक याद सो रहे को उठाती है आज भी

अजीत सिंह हसरत

तिरे जैसा मेरा भी हाल था न सुकून था न क़रार था

ऐतबार साजिद

रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया

ऐतबार साजिद

मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है

ऐतबार साजिद

कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है

ऐतबार साजिद

जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

ऐतबार साजिद

बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी

ऐतबार साजिद

तू ही इंसाफ़ से कह जिस का ख़फ़ा यार रहे

ऐश देहलवी

पाँव फँसे में हाथ छुड़ाने आया था

ऐनुद्दीन आज़िम

जो मैं ने कह दिया उस से मुकरने वाला नहीं

ऐनुद्दीन आज़िम

अब जुनूँ के रत-जगे ख़िरद में आ गए

ऐनुद्दीन आज़िम

पहले तो शहर ऐसा न था

ऐन ताबिश

अदम से परे

ऐन ताबिश

आँसुओं के रतजगों से

ऐन ताबिश

क़िस्सा-ए-ख़्वाब हूँ हासिल नहीं कोई मेरा

ऐन ताबिश

ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए

ऐन ताबिश

कैसे अफ़्सूँ थे वहाँ कैसे फ़साने थे उधर

ऐन ताबिश

न तीरगी के लिए हूँ न रौशनी के लिए

ऐन सलाम

क़ल्ब की बंजर ज़मीं पर ख़्वाहिशें बोते हुए

ऐन इरफ़ान

क्या किसी बात की सज़ा है मुझे

ऐन इरफ़ान

इक साया मेरे जैसा है

ऐन इरफ़ान

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