विचार Poetry (page 9)

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़-ए-यार के

सुरूर बाराबंकवी

अब तो दिल ओ दिमाग़ में कोई ख़याल भी नहीं

सुनील कुमार जश्न

रौशनी क्या पड़ी है कमरे में

सुनील आफ़ताब

जो कश्मकश थी तिरा इंतिज़ार करते हुए

सुलतान निज़ामी

बाहर हिसार-ए-ग़म से फ़क़त देखने में था

सुलतान निज़ामी

इस एक सोच में गुम हैं ख़याल जितने हैं

सुलेमान ख़ुमार

तुझे क्या हुआ है बता ऐ दिल न सुकून है न क़रार है

सुलैमान अहमद मानी

अपने ही आप में असीर हूँ मैं

सुलैमान अहमद मानी

हँस दिए ज़ख़्म-ए-जिगर जैसे कि गुल-हा-ए-बहार

सुहैल काकोरवी

उजड़े दिल-ओ-दिमाग़ को आबाद कर सकूँ

सुहैल अहमद ज़ैदी

जो कुछ हुआ सो हुआ अब सवाल ही क्या है

सुहा मुजद्ददी

इसी आशिक़ी में पैहम हुई ख़ानुमाँ-ख़राबी

सुहा मुजद्ददी

'अंजुम' पे जो गुज़र गई उस का भला हिसाब क्या

सूफ़िया अनजुम ताज

वफ़ा की आख़िरी मंज़िल भी आ रही है क़रीब

सूफ़ी तबस्सुम

कुछ और गुमरही-ए-दिल का राज़ क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

किसी में ताब-ए-अलम नहीं है किसी में सोज़-ए-वफ़ा नहीं है

सूफ़ी तबस्सुम

दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा

सुदर्शन फ़ाकिर

अहल-ए-उल्फ़त के हवालों पे हँसी आती है

सुदर्शन फ़ाकिर

कब करोगे हमारा इस्तिक़बाल

सुबोध लाल साक़ी

तू आग रखना कि आब रखना

सुभाष पाठक ज़िया

उस को मेरा मलाल है अब भी

सोनरूपा विशाल

अपनी मर्ज़ी का रुख़ मैं अपनाऊँ

सोनरूपा विशाल

तेरा ही ज़िक्र हरसू तिरा ही बयाँ मिले

सिया सचदेव

रिश्तों की काएनात में सिमटी हुई हूँ मैं

सिया सचदेव

वो भीड़ है कि ढूँढना तेरा तो दरकिनार

सिराज लखनवी

हाँ तुम को भूल जाने की कोशिश करेंगे हम

सिराज लखनवी

ये वो आज़माइश-ए-सख़्त है कि बड़े बड़े भी निकल गए

सिराज लखनवी

मिला-दिला सही इक ख़ुश्क हार बाक़ी है

सिराज लखनवी

मदद ऐ ख़याल-ए-माज़ी ज़रा आइना उठाना

सिराज लखनवी

नियाज़-ए-बे-ख़ुदी बेहतर नमाज़-ए-ख़ुद-नुमाई सीं

सिराज औरंगाबादी

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