विचार Poetry (page 10)

ज़ालिम मिरे जिगर कूँ करे क्यूँ न फाँक फाँक

सिराज औरंगाबादी

तुझ पर फ़िदा हैं सारे हुस्न-ओ-जमाल वाले

सिराज औरंगाबादी

तेरी भँवों की तेग़ के जो रू-ब-रू हुआ

सिराज औरंगाबादी

तेरे अबरू की अजब बैत है हाली ऐ शोख़

सिराज औरंगाबादी

सनम जब चीरा-ए-ज़र-तार बाँधे

सिराज औरंगाबादी

मुझ सीं ग़म दस्त-ओ-गरेबाँ न हुआ था सो हुआ

सिराज औरंगाबादी

मख़मूर चश्मों की तबरीद करने कूँ शबनम है सरदाब शोरों की मानिंद

सिराज औरंगाबादी

काफ़िर हुआ हूँ रिश्ता-ए-ज़ुन्नार की क़सम

सिराज औरंगाबादी

है दिल में ख़याल-ए-गुल-ए-रुख़्सार किसी का

सिराज औरंगाबादी

देखा है जिस ने यार के रुख़्सार की तरफ़

सिराज औरंगाबादी

चराग़-ए-मह सीं रौशन-तर है हुस्न-ए-बे-मिसाल उस का

सिराज औरंगाबादी

भरा कमाल-ए-वफ़ा सें ख़याल का शीशा

सिराज औरंगाबादी

अमल सें मय-परस्तों के तुझे क्या काम ऐ वाइ'ज़

सिराज औरंगाबादी

अग़्यार छोड़ मुझ सें अगर यार होवेगा

सिराज औरंगाबादी

रंग लाया दिवाना-पन मेरा

सिकंदर अली वज्द

हज़ार नक़्स हैं मुझ में मिरे कमाल को देख

सिकंदर अली वज्द

वही रंग-ए-रुख़ पे मलाल था ये पता न था

सिद्दीक़ मुजीबी

मौज-ए-ख़याल-ए-यार ग़म-ए-आसार आई है

सिद्दीक़ मुजीबी

झोंका नफ़स का मौजा-ए-सरसर लगा मुझे

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

निकाल लाया है घर से ख़याल का क्या हो

सिद्दीक़ शाहिद

इश्क़ में इज़्तिराब रहता है

बाबू सि द्दीक़ निज़ामी

मसअले का हल न निकला देर तक

श्याम सुन्दर नंदा नूर

सफ़र गुमाँ है रास्ता ख़याल है

शुमाइला बहज़ाद

उस को न ख़याल आए तो हम मुँह से कहें क्या

शुजा ख़ावर

यहाँ वहाँ की बुलंदी में शान थोड़ी है

शुजा ख़ावर

उस को न ख़याल आए तो हम मुँह से कहें क्या

शुजा ख़ावर

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

बरपा तिरे विसाल का तूफ़ान हो चुका

शुजा ख़ावर

हिज्र ओ विसाल

शोरिश काश्मीरी

वो और होंगे जो वहम-ओ-गुमाँ के साथ चले

शोला हस्पानवी

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