भगवान Poetry (page 13)

अब इतनी अर्ज़ां नहीं बहारें वो आलम-ए-रंग-ओ-बू कहाँ है

सिराज लखनवी

कोई महबूब सितमगर भी तो हो सकता है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

ये तग़य्युर रू-नुमा हो जाएगा सोचा न था

सिराज अजमली

झुका के सर को चलना जिस जगह का क़ाएदा था

सिराज अजमली

ना-ख़लफ़ मिज़ाज की मुसद्दक़ा तस्लीमात

सिदरा सहर इमरान

मुर्दा लोगों की तस्वीरी नुमाइश

सिदरा सहर इमरान

तू हर्फ़-ए-आख़िरी मिरा क़िस्सा तमाम है

सिदरा सहर इमरान

रहबर मिला न हम को कोई रहनुमा मिला

सिद्दीक़ उमर

नाख़ुदा हो कि ख़ुदा देखते रह जाते हैं

सिद्दीक़ मुजीबी

प्यासा जो मेरे ख़ूँ का हुआ था सो ख़्वाब था

सिद्दीक़ मुजीबी

न कोई नक़्श न पैकर सराब चारों तरफ़

सिद्दीक़ मुजीबी

मैं भी आवारा हूँ तेरे सात आवारा हवा

सिद्दीक़ मुजीबी

दिल ही गिर्दाब-ए-तमन्ना है यहीं डूबते हैं

सिद्दीक़ मुजीबी

बे-कराँ समझा था ख़ुद को कैसे नादानों में था

सिद्दीक़ मुजीबी

अजीब धुँद है आँखों को सूझता भी नहीं

सिद्दीक़ मुजीबी

आग देखूँ कभी जलता हुआ बिस्तर देखूँ

सिद्दीक़ मुजीबी

आज बेचैन है बीमार ख़ुदा ख़ैर करे

बाबू सि द्दीक़ निज़ामी

बादा-ए-इश्क़ से सरशार गुरु-नानक थे

श्याम सुंदर लाल बर्क़

सफ़र गुमाँ है रास्ता ख़याल है

शुमाइला बहज़ाद

विज्दान में वो आया इल्हाम हुआ मुझ को

शुजा ख़ावर

समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले

शुजा ख़ावर

ख़ुद फ़रिश्ते तो नहीं हैं जो मुझे ले जा रहे हैं

शुजा ख़ावर

कहाँ कहाँ है ख़ुदा जाने राब्ता दिल का

शुजा ख़ावर

इस ए'तिबार से बे-इंतिहा ज़रूरी है

शुजा ख़ावर

इक़बाल से हम-कलामी

शोरिश काश्मीरी

रास्ते पुर-पेच राही रुस्तगार

शोरिश काश्मीरी

तेरी उल्फ़त में न जाने क्या से क्या हो जाऊँगा

शोला हस्पानवी

जिस को जाना था कल तक ख़ुदा की तरह

शोला हस्पानवी

अपना ख़ालिक़ ख़ुद ही था मेरा ख़ुदा कोई न था

शोला हस्पानवी

शुक्र को शिकवा-ए-जफ़ा समझे

शोला अलीगढ़ी

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