दृश्य Poetry (page 35)

कभी अंगड़ाई ले कर जब समुंदर जाग उठता है

अरशद कमाल

फ़ना हुआ तो मैं तार-ए-नफ़स में लौट आया

अरशद जमाल 'सारिम'

ये दौर-ए-ख़िरद है दौर-ए-जुनूँ इस दौर में जीना मुश्किल है

अर्श मलसियानी

फ़सील-ए-ज़ात से बाहर भी देखना है मुझे

आरिफ़ इमाम

दिल क्या किसी की बात से अंदर से कट गया

आरिफ़ अंसारी

दास्ताँ भी मुख़्तलिफ़ लहजा भी यारों से जुदा

आरिफ़ अंसारी

हर इश्क़ के मंज़र में था इक हिज्र का मंज़र

अक़ील अब्बास जाफ़री

एहसास-ए-ज़ियाँ हम में से अक्सर में नहीं था

अक़ील अब्बास जाफ़री

मेरी नज़र के लिए कोई रिवायत न थी

अनवर सिद्दीक़ी

कोई भी पेचीदगी हाएल नहीं अनवर-'सदीद'

अनवर सदीद

ज़ोर से आँधी चली तो बुझ गए सारे चराग़

अनवर सदीद

न होंगे हम तो ये रंग-ए-गुलिस्ताँ कौन देखेगा

अनवर साबरी

मख़मली ख़्वाब का आँखों में न मंज़र फैला

अनवर मीनाई

हर मंज़र-ए-ख़ुश-रंग सुलग जाए तो क्या हो

अनवर मीनाई

गुम कर दें इक ज़रा तुझे ख़्वाबों के शहर में

अनवर मीनाई

साथ उस के कोई मंज़र कोई पस-ए-मंज़र न हो

अनवर मसूद

घर

अनवर मसूद

कब ज़िया-बार तिरा चेहरा-ए-ज़ेबा होगा

अनवर मसूद

कब तलक यूँ धूप छाँव का तमाशा देखना

अनवर मसूद

बस अब तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहुत पहलू निकलते हैं

अनवर मसूद

बे-घर था फिर छोड़ गया घर जाने क्यूँ

अनवर जमाल अनवर

दर्द उरूज पर आ जाए तो

अनवार फ़ितरत

नए दिनों के नए सहीफ़ों में ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नहीं है

अनवर अलीमी

जुर्म ठहरा हाल से आगे का नक़्शा देखना

अनसर अली अनसर

इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे

अंजुम तराज़ी

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था

अंजुम तराज़ी

मौसम का आह-ओ-नाला से अंदाज़ा कीजिए

अंजुम रूमानी

मिरी आवाज़ सुन कर ज़िंदगी बेदार हो जैसे

अंजुम नियाज़ी

चाँद हम दोनों से मुशाबह है

अंजुम ख़लीक़

हर शे'र से मेरे तिरा पैकर निकल आए

अंजुम ख़लीक़

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