दृश्य Poetry (page 38)
अब छलकते हुए साग़र नहीं देखे जाते
अली अहमद जलीली
रूह की बात सुने जिस्म के तेवर देखे
अली अब्बास उम्मीद
मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ
अलीना इतरत
अँधेरी शब का ये ख़्वाब-मंज़र मुझे उजालों से भर रहा है
अलीना इतरत
मुझे तो इंतिज़ार-ए-इश्क़ में ही लुत्फ़ आता है
अलीना इतरत
ये किस मुहिम पर चले थे हम जिस में रास्ते पुर-ख़तर न आए
अलीना इतरत
सारे मौसम बदल गए शायद
अलीना इतरत
मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ
अलीना इतरत
मैं जिस का मुंतज़िर हूँ वो मंज़र पुकार ले
अलीम सबा नवेदी
उठते हुए तूफ़ान का मंज़र नहीं देखा
आलमताब तिश्ना
मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे
आलमताब तिश्ना
मिरे हिसार से बाहर बुला रहा है मुझे
आलम ख़ुर्शीद
क्यूँ आँखें बंद कर के रस्ते में चल रहा हूँ
आलम ख़ुर्शीद
कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ
अकरम नक़्क़ाश
कोई इल्ज़ाम मेरे नाम मेरे सर नहीं आया
अकरम नक़्क़ाश
गहरी सूनी राह और तन्हा सा मैं
अकरम नक़्क़ाश
कोई हुनर तो मिरी चश्म-ए-अश्क-बार में है
अकरम महमूद
ख़ाक से ख़्वाब तलक एक सी वीरानी है
अकरम महमूद
आँख खुलने पे भी होता हूँ उसी ख़्वाब में गुम
अकरम महमूद
काले सफ़ेद परों वाला परिंदा और मेरी एक शाम
अख़्तर-उल-ईमान
शाम
अख़्तर उस्मान
वक़्त की क़द्र
अख़्तर शीरानी
ओ देस से आने वाले बता
अख़्तर शीरानी
दावत
अख़्तर शीरानी
बस्ती की लड़कियों के नाम
अख़्तर शीरानी
बरखा-रुत
अख़्तर शीरानी
वक़्त बे-रहम है मक़्तल की ज़मीनों जैसा
अख़तर शाहजहाँपुरी
जो क़तरे में समुंदर देखते हैं
अख़तर शाहजहाँपुरी
हर बुत यहाँ टूटे हुए पत्थर की तरह है
अख़तर इमाम रिज़वी
तूफ़ाँ से क़र्या क़र्या एक हुए
अख़्तर होशियारपुरी
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