मौज Poetry (page 23)

गिर्दाब-ए-रेग-ए-जान से मौज-ए-सराब तक

अज़हर नक़वी

ये जो रहते हैं बहुत मौज में शब भर हम लोग

अज़हर फ़राग़

कोई भी शक्ल मिरे दिल में उतर सकती है

अज़हर फ़राग़

कमी है कौन सी घर में दिखाने लग गए हैं

अज़हर फ़राग़

धूप में साया बने तन्हा खड़े होते हैं

अज़हर फ़राग़

ये रात आख़िरी लोरी सुनाने वाली है

अज़हर अब्बास

लाई न सबा बू-ए-चमन अब के बरस भी

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ुग़ाँ से तर्क-ए-फ़ुग़ाँ तक हज़ार तिश्ना-लबी है

अज़ीम मुर्तज़ा

बुझने लगे नज़र तो फिर उस पार देखना

अय्यूब ख़ावर

निगाह कोई तो तूफ़ाँ में मेहरबान सी है

अतुल अजनबी

कुछ और दिन अभी उस जा क़याम करना था

अतीक़ुल्लाह

ग़म के बादल दिल-ए-नाशाद पे ऐसे छाए

अतहर राज़

इतने दिन के बाद तू आया है आज

अतहर नफ़ीस

किस दर्जा मिरे शहर की दिलकश है फ़ज़ा भी

अतहर नादिर

उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए

अतीक़ अंज़र

बिखर बिखर गया इक मौज-ए-राएगाँ की तरह

अताउर्रहमान क़ाज़ी

किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ

अताउर्रहमान क़ाज़ी

ढला जो दिन तो गया नूर-ए-आफ़्ताब भी साथ

अता हुसैन कलीम

रात और रेल

असरार-उल-हक़ मजाज़

पहला जश्न-ए-आज़ादी

असरार-उल-हक़ मजाज़

अयादत

असरार-उल-हक़ मजाज़

रंग सारे अपने अंदर रफ़्तगाँ के हैं

असलम महमूद

इंतिज़ार

असलम इमादी

कभी ऐसा तमव्वुज तुम ने देखा है

असलम अंसारी

ऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चल

असलम अंसारी

वो रंग उड़े हैं कुछ अब के बरस बहारों के

असलम अंसारी

हर शख़्स इस हुजूम में तन्हा दिखाई दे

असलम अंसारी

बुझी है आतिश-ए-रंग-ए-बहार आहिस्ता आहिस्ता

असलम अंसारी

ऐन-मुमकिन है किसी तर्ज़-ए-अदा में आए

असलम अंसारी

झंकार है मौजों की बहते हुए पानी से

अासिफ़ साक़िब

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