मौज Poetry (page 28)

शश-जिहत

अख़्तर उस्मान

मुझे ले चल

अख़्तर शीरानी

दिल-ए-दीवाना ओ अंदाज़-ए-बेबाकाना रखते हैं

अख़्तर शीरानी

हर मौज गले लग के ये कहती है ठहर जाओ

अख़्तर सईद ख़ान

याद आएँ जो अय्याम-ए-बहाराँ तो किधर जाएँ

अख़्तर सईद ख़ान

गुज़रना है जी से गुज़र जाइए

अख़्तर सईद ख़ान

बताएँ क्या कि कहाँ पर मकान होते थे

अख़्तर रज़ा सलीमी

मक़ाम-ए-दिल बहुत ऊँचा बना है

अख़्तर ओरेनवी

वो ख़ुद तो मर ही गया था मुझे भी मार गया

अख़तर इमाम रिज़वी

जीते-जी दुख सुख के लम्हे आते जाते रहते हैं

अख़तर इमाम रिज़वी

दिल वो प्यासा है कि दरिया का तमाशा देखे

अख़तर इमाम रिज़वी

हिज्र इक हुस्न है इस हुस्न में रहना अच्छा

अख़्तर हुसैन जाफ़री

यक-ब-यक मौसम की तब्दीली क़यामत ढा गई

अख़्तर होशियारपुरी

मैं उस का नाम घुले पानियों पे लिखता क्या

अख़्तर होशियारपुरी

ख़्वाहिशें इतनी बढ़ीं इंसान आधा रह गया

अख़्तर होशियारपुरी

बारहा ठिठका हूँ ख़ुद भी अपना साया देख कर

अख़्तर होशियारपुरी

ज़िंदगी होगी मिरी ऐ ग़म-ए-दौराँ इक रोज़

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

ये रंग-ओ-कैफ़ कहाँ था शबाब से पहले

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

सहारा दे नहीं सकते शिकस्ता पाँव को

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

न राज़-ए-इब्तिदा समझो न राज़-ए-इंतिहा समझो

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

लुत्फ़ ले ले के पिए हैं क़दह-ए-ग़म क्या क्या

अख़्तर अंसारी

दूर तक बस इक धुँदलका गर्द-ए-तन्हाई का था

अकबर हैदराबादी

तरीक़-ए-इश्क़ में मुझ को कोई कामिल नहीं मिलता

अकबर इलाहाबादी

जल्वा अयाँ है क़ुदरत-ए-परवरदिगार का

अकबर इलाहाबादी

पेश जो आया सर-ए-साहिल शब बतलाया

अजमल सिराज

गुज़र गई है अभी साअत-ए-गुज़िश्ता भी

अजमल सिराज

ख़त जो तेरे नाम लिखा, तकिए के नीचे रखता हूँ

अजमल सिद्दीक़ी

फ़िरऔन-ए-वक़्त कोई भी हो सर-कशी करो

अजमल अजमली

आग़ाज़-ए-मोहब्बत में 'आजिज़' रुकती न थी मौज-ए-अश्क-ए-रवाँ

आजिज़ मातवी

मौजूद हैं वो भी बालीं पर अब मौत का टलना मुश्किल है

आजिज़ मातवी

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