मौसम Poetry (page 7)

आँखों को मयस्सर कोई मंज़र ही नहीं था

सुहैल अहमद ज़ैदी

दीद का इसरार मूसा लन-तरानी कोह-ए-तूर

सुग़रा आलम

सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई

सूफ़ी तबस्सुम

किसी नय रूह को जिस्मी क़बाएँ भेजी हैं

सुबोध लाल साक़ी

अब ख़िज़ाँ आए या बहार आए

सोज़ नजीबाबादी

क़फ़स से दूर सही मौसम-ए-बहार तो है

सिराज लखनवी

ये वो आज़माइश-ए-सख़्त है कि बड़े बड़े भी निकल गए

सिराज लखनवी

ये इंक़लाब भी ऐ दौर-ए-आसमाँ हो जाए

सिराज लखनवी

जानाँ पे जी निसार हुआ क्या बजा हुआ

सिराज औरंगाबादी

बहुत उदास है दिल जाने माजरा क्या है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

टूट कर अंदर से बिखरे और हम जल-थल हुए

सिद्दीक़ा शबनम

ये रोज़ ओ शब का तसलसुल रवाँ-दवाँ ही रहा

सिद्दीक़ शाहिद

फ़ुग़ान-ए-रूह कोई किस तरह सुनाए उसे

सिद्दीक़ शाहिद

दिल की बस्ती पे किसी दर्द का साया भी नहीं

सिद्दीक़ शाहिद

खेल

शोरिश काश्मीरी

दिल उस से लगा जिस से रूठा भी नहीं जाता

शोहरत बुख़ारी

मेरे क़दमों पर निगूँ मेरा ही सर है भी तो क्या

शोएब निज़ाम

अब्र का टुकड़ा कोई बाला-ए-बाम आता हुआ

शोएब निज़ाम

न है उस को मुझ से ग़फ़लत न वो ज़िम्मेदार कम है

शिफ़ा कजगावन्वी

वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुए

शीन काफ़ निज़ाम

दीप जले तो दीप बुझाने आते हैं

शाज़िया अकबर

दिल-ओ-निगाह के हुस्न-ओ-क़रार का मौसम

शाज़िया अकबर

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म

शाज़ तमकनत

मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए

शाज़ तमकनत

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

हज़ारों मुश्किलें हैं और लाखों ग़म लिए हैं हम

शायान क़ुरैशी

तिरी साज़िशों से ही जुगनू मरे

शाैकत हाशमी

जो कहता है कि दरिया देख आया

शारिक़ कैफ़ी

ये और बात कि गमले में उग रहा हूँ मैं

शमीम क़ासमी

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