संभव Poetry (page 12)

आँख में ख़्वाब ज़माने से अलग रक्खा है

दिलावर अली आज़र

ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे

द्वारका दास शोला

इंसाँ ब-यक निगाह बुरा भी भला भी है

द्वारका दास शोला

इल्म

दाऊद ग़ाज़ी

पर्दा-दार हस्ती थी ज़ात के समुंदर में

दत्तात्रिया कैफ़ी

समझना फ़हम गर कुछ है तबीई से इलाही को

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

किसी ने बा-वफ़ा समझा किसी ने बेवफ़ा समझा

डी. राज कँवल

कैसा वो मौसम था ये तो समझ न पाए हम

चंद्र प्रकाश शाद

दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना

चकबस्त ब्रिज नारायण

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

सब ने होंटों से लगा कर तोड़ डाला है मुझे

भारत भूषण पन्त

हुआ जो वक़्फ़-ए-ग़म वो दिल किसी का हो नहीं सकता

बेख़ुद देहलवी

न चिलमनों की हसीं सरसराहटें होंगी

बेकल उत्साही

यूँ तो जो चाहे यहाँ साहब-ए-महफ़िल हो जाए

बहज़ाद लखनवी

दिल मेरा तेरा ताब-ए-फ़रमाँ है क्या करूँ

बहज़ाद लखनवी

शादी ओ अलम सब से हासिल है सुबुकदोशी

बेदम शाह वारसी

खींची है तसव्वुर में तस्वीर-ए-हम-आग़ोशी

बेदम शाह वारसी

अगर काबा का रुख़ भी जानिब-ए-मय-ख़ाना हो जाए

बेदम शाह वारसी

नक़्श बर-दीवार

बेबाक भोजपुरी

रिहाई जीते जी मुमकिन नहीं है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

वो सूरत गर्द-ए-ग़म में छुप गई हो

बशीर बद्र

कौन आया रास्ते आईना-ख़ाने हो गए

बशीर बद्र

दीमक

बाक़र मेहदी

ख़बर सुनेगा मिरी मौत की तो ख़ुश होगा

बाक़र मेहदी

मैं, एक और मैं

बलराज कोमल

दीवारें

बलराज कोमल

दीदा-ए-तर

बलराज कोमल

यार को हम ने बरमला देखा

बहराम जी

न दो दुश्नाम हम को इतनी बद-ख़़ूई से क्या हासिल

ज़फ़र

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