विकास Poetry (page 4)

घर बनाने में तमाम अहल-ए-सफ़र लग गए हैं

फ़रहत एहसास

जल्वा है वो कि ताब-ए-नज़र तक नहीं रही

फ़रहत अब्बास

हम से मिल कर कोई गुफ़्तुगू कीजिए

फ़रहत अब्बास

आ गया ईसार मेरे हल्क़ा-ए-अहबाब में

एजाज़ अासिफ़

खींच कर अक्स फ़साने से अलग हो जाओ

दिलावर अली आज़र

अक्स मंज़र में पलटने के लिए होता है

दिलावर अली आज़र

कुछ ऐसा पास-ए-ग़ैरत उठ गया इस अहद-ए-पुर-फ़न में

चकबस्त ब्रिज नारायण

उदास काग़ज़ी मौसम में रंग ओ बू रख दे

बेकल उत्साही

जितने थे रंग हुस्न-ए-बयाँ के बिगड़ गए

अज़ीज़ क़ैसी

जीते हैं कैसे ऐसी मिसालों को देखिए

अज़ीज़ लखनवी

जीते हैं कैसे ऐसी मिसालों को देखिए

अज़ीज़ लखनवी

वो एक रौ जो लब-ए-नुक्ता-चीं में होती है

अज़ीज़ हामिद मदनी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

सलीब ओ दार के क़िस्से रक़म होते ही रहते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

मिरी आँखें गवाह-ए-तल'अत-ए-आतिश हुईं जल कर

अज़ीज़ हामिद मदनी

हमारे चेहरे पे रंज-ओ-मलाल ऐसा था

अज़हर नैयर

मेरी नुमू है तेरे तग़ाफ़ुल से वाबस्ता

अज़हर फ़राग़

चराग़-ए-क़ुर्ब की लौ से पिघल गया वो भी

अय्यूब ख़ावर

कितना मुश्किल है

अतीक़ुल्लाह

तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा

असलम महमूद

हर रंग-ए-तरब मौसम ओ मंज़र से निकाला

असलम महमूद

मय-शिकस्ता-दिली ऐ हरीफ़-ए-ज़ौक़-ए-नुमू

असलम अंसारी

ऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चल

असलम अंसारी

रास्ता कोई सफ़र कोई मसाफ़त कोई

असअ'द बदायुनी

ग़ज़ल में जान पड़ी गुफ़्तुगू में फूल खिले

अरशद अब्दुल हमीद

ग़लत नहीं है दिल-ए-सुल्ह-ख़ू जो बोलता है

अरशद अब्दुल हमीद

मैं लिख कर हो सकूँगा सुर्ख़-रू क्या

अरमान नज्मी

बुझी नहीं अभी ये प्यास भी ग़नीमत है

अरमान नज्मी

नख़्ल-ए-अना में ज़ोर-ए-नुमू किस ग़ज़ब का था

अंजुम ख़लीक़

पलकों तक आ के अश्क का सैलाब रह गया

अंजुम ख़लीक़

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