नज़र Poetry (page 10)

दर्द-ओ-ग़म रंज-ओ-अलम आह-ओ-फ़ुग़ाँ

योगेन्द्र बहल तिश्ना

आती है फ़ुग़ाँ लब पे मिरे क़ल्ब-ओ-जिगर से

योगेन्द्र बहल तिश्ना

सूरज के साथ साथ उभारे गए हैं हम

यज़दानी जालंधरी

लबों तक आया ज़बाँ से मगर कहा न गया

यज़दानी जालंधरी

जहाँ कुछ लोग दीवाने बने हैं

यज़दानी जालंधरी

जादा-ए-ज़ीस्त पे बरपा है तमाशा कैसा

यज़दानी जालंधरी

सहने को तो सह जाएँ ग़म-ए-कौन-ओ-मकाँ तक

यावर अब्बास

पर्दा आँखों से हटाने में बहुत देर लगी

यासमीन हामिद

पर्दा आँखों से हटाने में बहुत देर लगी

यासमीन हामिद

उस इमारत को गिरा दो जो नज़र आती है

यासमीन हमीद

एक इक हर्फ़ समेटो मुझे तहरीर करो

यासमीन हमीद

किसी कशिश के किसी सिलसिले का होना था

यासमीन हबीब

जो नज़र किया मैं सिफ़ात में हुआ मुझ पे कब ये अयाँ नहीं

यासीन अली ख़ाँ मरकज़

ग़फ़लत अजब है हम को दम जिस का मारते हैं

यासीन अली ख़ाँ मरकज़

करम नहीं तो सितम ही सही रवा रखना

यासीन क़ुदरत

रेत के इक शहर में आबाद हैं दर दर के लोग

यासीन अफ़ज़ाल

लर्ज़ां तरसाँ मंज़र चुप

याक़ूब यावर

ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र कुछ और कहती है

याक़ूब उस्मानी

तूफ़ाँ की ज़द पे अपना सफ़ीना जब आ गया

याक़ूब उस्मानी

करम के इस दौर-ए-इम्तिहाँ से वो दौर-ए-मश्क़-ए-सितम ही अच्छा

याक़ूब उस्मानी

हल ही न हो जिस का वो मुअम्मा तो नहीं है

याक़ूब उस्मानी

हवा-ए-सुब्ह-ए-नुमू दुश्मन-ए-चमन कैसे

याक़ूब राही

ये हम ने माना कि होगा विसाल-ए-यार नसीब

याक़ूब अली आसी

क्या हुआ हम से जो दुनिया बद-गुमाँ होने लगी

याक़ूब आमिर

आतिश-ए-ग़म में भभूका दीदा-ए-नमनाक था

याक़ूब आमिर

यार कब दिल की जराहत पे नज़र करता है

इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन

सलामत रहें दिल में घर करने वाले

यगाना चंगेज़ी

ख़ुदाओं की ख़ुदाई हो चुकी बस

यगाना चंगेज़ी

ख़ुदा की मार वो अय्याम-ए-शोर-ओ-शर गुज़रे

यगाना चंगेज़ी

चलता नहीं फ़रेब किसी उज़्र-ख़्वाह का

यगाना चंगेज़ी

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