नज़र Poetry (page 11)

तुम हर इक रंग में ऐ यार नज़र आते हो

वज़ीर अली सबा लखनवी

देख कर ख़ुश-रंग उस गुल-पैरहन के हाथ पाँव

वज़ीर अली सबा लखनवी

बुत-परस्ती से न तीनत मिरी ज़िन्हार फिरी

वज़ीर अली सबा लखनवी

बच कर कहाँ मैं उन की नज़र से निकल गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

अश्क-उफ़्तादा नज़र आते हैं सारे दरिया

वज़ीर अली सबा लखनवी

आप अपनी बेवफ़ाई देखिए

वज़ीर अली सबा लखनवी

सकता

वज़ीर आग़ा

रेज़ा रेज़ा कर जाता है

वज़ीर आग़ा

जब आँख खुली मेरी

वज़ीर आग़ा

दीवार-ए-गिर्या

वज़ीर आग़ा

आवेज़िश

वज़ीर आग़ा

उम्र की इस नाव का चलना भी क्या रुकना भी क्या

वज़ीर आग़ा

तुम्हें ख़बर भी न मिली और हम शिकस्ता-हाल

वज़ीर आग़ा

तिरा ही रूप नज़र आए जा-ब-जा मुझ को

वज़ीर आग़ा

सहर ने आ कर मुझे सुलाया तो मैं ने जाना

वज़ीर आग़ा

किस किस से न वो लिपट रहा था

वज़ीर आग़ा

ख़ुद से हुआ जुदा तो मिला मर्तबा तुझे

वज़ीर आग़ा

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था

वज़ीर आग़ा

हरीम-ए-नाज़ को हम ग़ैर की महफ़िल नहीं कहते

वासिफ़ देहलवी

बयाँ ऐ हम-नशीं ग़म की हिकायत और हो जाती

वासिफ़ देहलवी

लगता है जुदा सब से किरदार 'वसीम' उस का

वसीम मलिक

मफ़रूर कभी ख़ुद पर शर्मिंदा नज़र आए

वसीम मलिक

फूल अपने वस्फ़ सुनते हैं उस ख़ुश-नसीब से

वसीम ख़ैराबादी

पत्थर नज़र थी वाइ'ज़-ए-ख़ाना-ख़राब की

वसीम ख़ैराबादी

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

वसीम बरेलवी

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है

वसीम बरेलवी

ख़्वाब नहीं देखा है

वसीम बरेलवी

तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा

वसीम बरेलवी

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते

वसीम बरेलवी

मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है

वसीम बरेलवी

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