नज़र Poetry (page 115)

मैं केवल अब ख़ुद से रिश्ता रक्खूँगा

अमित शर्मा मीत

हम ने पाला मुद्दतों पहलू में हम कोई नहीं

अमीरुल्लाह तस्लीम

ग़ैब से सहरा-नवरदों का मुदावा हो गया

अमीरुल्लाह तस्लीम

फ़िक्र है शौक़-ए-कमर इश्क़-ए-दहाँ पैदा करूँ

अमीरुल्लाह तस्लीम

सुर्ख़ सितारा

आमिर उस्मानी

ख़्वाब जो बिखर गए

आमिर उस्मानी

इल्तिजा

आमिर उस्मानी

शब को जब यूरिश-ए-विज्दान में आ जाते हैं

आमिर नज़र

कुछ सुलगते हुए ख़्वाबों की फ़रावानी है

आमिर नज़र

जबीं को चैन कहाँ ज़ेर-ए-लब दुआ है बस

आमिर नज़र

फ़िशार-ए-तीरह-शबी से सहर निकल आए

आमिर नज़र

दरपेश तो हैं दीदा-ए-हैरान हज़ारों

आमिर नज़र

रक़ीब-ए-जाँ नज़र का नूर हो जाए तो क्या कीजे

अमीता परसुराम 'मीता'

आइने से नज़र चुराते हैं

अमीर क़ज़लबाश

पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ

अमीर क़ज़लबाश

नज़र नज़र हैरानी दे

अमीर क़ज़लबाश

न पूछ मंज़र-ए-शाम-ओ-सहर पे क्या गुज़री

अमीर क़ज़लबाश

लोग बनते हैं होशियार बहुत

अमीर क़ज़लबाश

कहीं सलीब कहीं कर्बला नज़र आए

अमीर क़ज़लबाश

हाँ ये तौफ़ीक़ कभी मुझ को ख़ुदा देता था

अमीर क़ज़लबाश

बनते हैं फ़रज़ाने लोग

अमीर क़ज़लबाश

ख़ुश्क सेरों तन-ए-शाएर का लहू होता है

अमीर मीनाई

कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं

अमीर मीनाई

काबा-ए-रुख़ की तरफ़ पढ़नी है आँखों से नमाज़

अमीर मीनाई

वस्ल की शब भी ख़फ़ा वो बुत-ए-मग़रूर रहा

अमीर मीनाई

तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है

अमीर मीनाई

पूछा न जाएगा जो वतन से निकल गया

अमीर मीनाई

जब से बाँधा है तसव्वुर उस रुख़-ए-पुर-नूर का

अमीर मीनाई

हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी

अमीर मीनाई

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शमाइल ठहरा

अमीर मीनाई

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