नज़र Poetry (page 94)

ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ है तो बाल-ओ-पर भी चाहिए

भारत भूषण पन्त

कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर

भारत भूषण पन्त

इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझ को

भारत भूषण पन्त

हर एक रात में अपना हिसाब कर के मुझे

भारत भूषण पन्त

दानिस्ता जो हो न सके नादानी से हो जाता है

भारत भूषण पन्त

लड़ गई उन से नज़र खिंच गए अबरू उन के

बेताब अज़ीमाबादी

अक़्ल दौड़ाई बहुत कुछ तो गुमाँ तक पहुँचे

बेताब अज़ीमाबादी

आइना देख के ख़ुर्शीद पे करते हैं नज़र

बेख़ुद देहलवी

वो सुन कर हूर की तारीफ़ पर्दे से निकल आए

बेख़ुद देहलवी

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

तुम्हें हम चाहते तो हैं मगर क्या

बेख़ुद देहलवी

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद

बेख़ुद देहलवी

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

ख़ुदा रक्खे तुझे मेरी बुराई देखने वाले

बेख़ुद देहलवी

कब तक करेंगे जब्र दिल-ए-ना-सुबूर पर

बेख़ुद देहलवी

जो तमाशा नज़र आया उसे देखा समझा

बेख़ुद देहलवी

हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा

बेख़ुद देहलवी

दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो

बेख़ुद देहलवी

दिल चुरा ले गई दुज़्दीदा-नज़र देख लिया

बेख़ुद देहलवी

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर

बेख़ुद देहलवी

बेचने आए कोई क्या दिल-ए-शैदा ले कर

बेख़ुद देहलवी

अदू को देख के जब वो इधर को देखते हैं

बेख़ुद देहलवी

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप

बेख़ुद देहलवी

यूँही रहा जो बुतों पर निसार दिल मेरा

बेखुद बदायुनी

नाले में कभी असर न आया

बेखुद बदायुनी

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

तुझ पर मिरी मोहब्बत क़ुर्बान हो न जाए

बहज़ाद लखनवी

तिरे इश्क़ में ज़िंदगानी लुटा दी

बहज़ाद लखनवी

मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है

बहज़ाद लखनवी

ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला

बहज़ाद लखनवी

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