नज़र Poetry (page 95)

फ़रियाद है अब लब पर जब अश्क-फ़िशानी थी

बहज़ाद लखनवी

इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया

बहज़ाद लखनवी

चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है

बहज़ाद लखनवी

अब आदमी कुछ और हमारी नज़र में है

बेदम शाह वारसी

शादी ओ अलम सब से हासिल है सुबुकदोशी

बेदम शाह वारसी

सहारा मौजों का ले ले के बढ़ रहा हूँ मैं

बेदम शाह वारसी

क़फ़स की तीलियों से ले के शाख़-ए-आशियाँ तक है

बेदम शाह वारसी

पर्दे उठे हुए भी हैं उन की इधर नज़र भी है

बेदम शाह वारसी

कभी यहाँ लिए हुए कभी वहाँ लिए हुए

बेदम शाह वारसी

हम मय-कदे से मर के भी बाहर न जाएँगे

बेदम शाह वारसी

गुल का किया जो चाक गरेबाँ बहार ने

बेदम शाह वारसी

हिकमत का बुत-ख़ाना

बेबाक भोजपुरी

ग़म-ए-आफ़ाक़ में आरिफ़ अगर करवट बदलता है

बेबाक भोजपुरी

दिल उचकेगी कि बिखरी है अड़ी है

बयान मेरठी

ले के दिल उस शोख़ ने इक दाग़ सीने पर दिया

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

वारफ़्तगी-ए-इश्क़ न जाए तो क्या करें

बासित भोपाली

शौक़ को बे-अदब किया इश्क़ को हौसला दिया

बासित भोपाली

सब काएनात-ए-हुस्न का हासिल लिए हुए

बासित भोपाली

मोहब्बत की इंतिहा चाहता हूँ

बासित भोपाली

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

हर तरफ़ सोज़ का अंदाज़ जुदागाना है

बासित भोपाली

लड़ ही जाए किसी निगार से आँख

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है

बशीर बद्र

यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो

बशीर बद्र

ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है

बशीर बद्र

उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ

बशीर बद्र

मिरी नज़र में ख़ाक तेरे आइने पे गर्द है

बशीर बद्र

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