नज़र Poetry (page 97)

एतिबार-ए-नज़र करें कैसे

बाक़ी सिद्दीक़ी

आस्तीं में साँप इक पलता रहा

बाक़ी सिद्दीक़ी

मुझ से बिछड़ के वो भी परेशान था बहुत

बाक़ी अहमदपुरी

जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक-न-शुद दो-शुद

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक न-शुद दो शुद

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सज़ा

बाक़र मेहदी

बहुत है एक नज़र

बाक़र मेहदी

अलविदा'अ

बाक़र मेहदी

सादा काग़ज़ पे कोई नाम कभी लिख लेना!

बाक़र मेहदी

रहता है ज़ुल्फ़-ए-यार मिरे मन से मन लगा

बाक़र आगाह वेलोरी

नहीं है अश्क से ये ख़ून-ए-नाब आँखों में

बाक़र आगाह वेलोरी

अगरचे दिल को ले साथ अपने आया अश्क मिरा

बाक़र आगाह वेलोरी

जाने क्या सोच के घर तक पहुँचा

बक़ा बलूच

किरदार ही से ज़ीनत-ए-अफ़्लाक हो गए

बनो ताहिरा सईद

इत्तिफ़ाक़

बलराज कोमल

ऐम्बुलेंस

बलराज कोमल

कहाँ से मंज़र समेट लाए नज़र कहाँ से उधार माँगे

लराज बख़्शी

और कुछ देर ग़म नज़र में रख

बकुल देव

जान ले ले न ज़ब्त-ए-आह कहीं

बकुल देव

हमें देखा न कर उड़ती नज़र से

बकुल देव

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं

बख़्श लाइलपूरी

उसी के ज़ुल्म से मैं हालत-ए-पनाह में था

बख़्श लाइलपूरी

तिश्नगी-ए-लब पे हम अक्स-ए-आब लिक्खेंगे

बख़्श लाइलपूरी

रुत न बदले तो भी अफ़्सुर्दा शजर लगता है

बख़्श लाइलपूरी

कोई शय दिल को बहलाती नहीं है

बख़्श लाइलपूरी

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर

ज़फ़र

लोगों का एहसान है मुझ पर और तिरा मैं शुक्र-गुज़ार

ज़फ़र

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