नूर Poetry (page 8)

ब-चशम-ए-हक़ीक़त जहाँ देखता हूँ

शाह आसिम

लोग हैं मुंतज़िर-ए-नूर-ए-सहर मुद्दत से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हमारे हाल पे किस दिन जफ़ा नहीं करते

शफ़क़त काज़मी

मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन

शफ़क़ सुपुरी

मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन

शफ़क़ सुपुरी

गुल-ए-ख़ुश-नुमा के लिबास में कि शुआ-ए-नूर में ढल के आ

शायर फतहपुरी

जी जाऊँ जो बंद नातिक़ा हो

शाद लखनवी

ख़्वाह मुफ़्लिसी से निकल गया या तवंगरी से निकल गया

शाद बिलगवी

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर-आरज़ू था

शाद अज़ीमाबादी

नज़्म

शबनम अशाई

रूह का सितारा

शब्बीर शाहिद

बहार की धूप में नज़ारे हैं उस किनारे

शब्बीर शाहिद

औरत

शाद आरफ़ी

सितम-गर को मैं चारा-गर कह रहा हूँ

शाद आरफ़ी

वो जो फ़िरदौस-ए-नज़र है आईना-ख़ाना अभी

सेहर इश्क़ाबादी

खोट की माला झूट जटाएँ अपने अपने ध्यान

सीमाब ज़फ़र

ख़िरद के जुमला दसातीर से मुकरते हुए

सीमाब ज़फ़र

रात दिन आग में पला सूरज

सीमा शर्मा मेरठी

हुआ दे कर दबे शो'लों को भड़काया नहीं जाता

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

सियाह रात के दरिया को पार करते चलो

सौरभ शेखर

एक रौज़न के अभी किरदार में हूँ मैं

सौरभ शेखर

हर संग में शरार है तेरे ज़ुहूर का

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बुलबुल ने जिसे जा के गुलिस्तान में देखा

मोहम्मद रफ़ी सौदा

इन्ना लिल्लाही ओ इन्ना इलैहि राजेऊन

सत्यपाल आनंद

वही है दश्त-ए-सफ़र रहगुज़र से आगे भी

सत्तार सय्यद

आए हैं रंग बहाली पर

सरवत हुसैन

दो आँखों से कम से कम इक मंज़र में

सरफ़राज़ ज़ाहिद

अफ़्सोस क्या जो हम भी तुम्हारे नहीं रहे

सरदार सोज़

कभी सुर्ख़ी से लिखता हूँ कभी काजल से लिखता हूँ

सरदार सलीम

एक ही ज़िंदा बचा है ये निराला पागल

सरदार सलीम

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