चित्रा Poetry (page 9)

हुज्रा-ए-ख़्वाब से बाहर निकला

हम्माद नियाज़ी

भूल जा मत रह किसी की याद में खोया हुआ

हामिद जीलानी

बे-कराँ दरिया हूँ ग़म का और तुग़्यानी में हूँ

हमीद नसीम

नियाज़-ओ-नाज़ का पैकर न अर्श पर ठहरा

हमीद कौसर

रख दिया है मिरी दहलीज़ पे पत्थर किस ने

हमीद अलमास

वो जो अब तक लम्स है उस लम्स का पैकर बने

हकीम मंज़ूर

टूट कर बिखरे न सूरज भी है मुझ को डर बहुत

हकीम मंज़ूर

मुंतशिर सायों का है या अक्स-ए-बे-पैकर का है

हकीम मंज़ूर

ढल गया जिस्म में आईने में पत्थर में कभी

हकीम मंज़ूर

आग जो बाहर है पहुँचेगी अंदर भी

हकीम मंज़ूर

रुजूअ बंदा की है इस तरह ख़ुदा की तरफ़

हैदर अली आतिश

कृष्ण कन्हैया

हफ़ीज़ जालंधरी

'इक़बाल' के मज़ार पर

हफ़ीज़ जालंधरी

लब-ए-फ़ुरात वही तिश्नगी का मंज़र है

हफ़ीज़ बनारसी

तू रंग है ग़ुबार हैं तेरी गली के लोग

हबीब जालिब

जिस को देखो शाम-सवेरे बे-कल है

हबीब कैफ़ी

गर मैं नहीं तो दर्द का पैकर कोई तो है

हबीब कैफ़ी

रात हर बार लिए

गुलनाज़ कौसर

शायद अभी कमी सी मसीहाइयों में है

गुलनार आफ़रीन

मैं ग़र्क़ वहाँ प्यास के पैकर की तरह था

गुहर खैराबादी

मिरे पर न बाँधो

ग़ज़ाला ख़ाकवानी

लब पे सुर्ख़ी की जगह जो मुस्कुराहट मल रहे हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

अपने अशआर को रुस्वा सर-ए-बाज़ार करूँ

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

दस्त-ए-राहत ने कभी रँज-ए-गिराँ-बारी ने

ग़ुलाम हुसैन साजिद

इक हुजूम-ए-ग़म-ओ-कुलफ़त है ख़ुदा ख़ैर करे

ग़ुलाम भीक नैरंग

नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का

ग़ालिब

न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सब्ज़ा-ए-ख़त से

ग़ालिब

बज़्म-ए-शाहंशाह में अशआर का दफ़्तर खुला

ग़ालिब

''बंगाल की रक़्क़ासा''

फ़ुर्क़त काकोरवी

उमीद की कोई चादर तो सामने आए

फ़िरदौस गयावी

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