फूल Poetry (page 12)

शहर सहरा है घर बयाबाँ है

सिद्दीक़ शाहिद

आग को फूल कहे जाएँ ख़िर्द-मंद अपने

सिद्दीक़ शाहिद

ज़िंदगी गुलशन में भी दुश्वार है तेरे बग़ैर

बाबू सि द्दीक़ निज़ामी

मल्बूस जब हवा ने बदन से चुरा लिए

सिब्त अली सबा

जलते जलते बुझ गई इक मोम-बत्ती रात को

सिब्त अली सबा

गाँव गाँव ख़ामोशी सर्द सब अलाव हैं

सिब्त अली सबा

ये मकीं क्या ये मकाँ सब ला-मकाँ का खेल है

शुजाअत इक़बाल

गिल भीक में लेते हैं जिस फूल से रानाई

शुजा

ज़ख़्म-ए-दिल अब फूल बन कर खिल गया

शोला हस्पानवी

वो जिस के दिल में निहाँ दर्द दो-जहाँ का था

शोला हस्पानवी

वो और होंगे जो वहम-ओ-गुमाँ के साथ चले

शोला हस्पानवी

तेरी उल्फ़त में न जाने क्या से क्या हो जाऊँगा

शोला हस्पानवी

साँस की आस निगहबाँ है ख़बर-दार रहो

शोहरत बुख़ारी

इक उम्र फ़साने ग़म-ए-जानाँ के गढ़े हैं

शोहरत बुख़ारी

आओ कि अभी छाँव सितारों की घनी है

शोहरत बुख़ारी

न तो गुँध हूँ किसी फूल की न ही फूल हूँ किसी बाग़ का

शिवकुमार बिलग्रामी

इक दामन में फूल भरे हैं इक दामन में आग ही आग

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

साक़ी-ए-दौराँ कहाँ वो तेरे मय-ख़ाने गए

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

वो रक़्स करने लगीं हवाएँ वो बदलियों का पयाम आया

शेवन बिजनौरी

हंगामा है न फ़ित्ना-ए-दौराँ है आज-कल

शेरी भोपाली

नदी किनारे जो नग़्मा-सरा मलंग हुए

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

जब सोज़ दुआ में ढलता है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए

ज़ौक़

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

ज़ौक़

यूँ अपने दिल के बोझ को कुछ कम किया गया

शहज़ाद रज़ा लम्स

किसी के साथ अब साया नहीं है

शीन काफ़ निज़ाम

एक रात आप ने उम्मीद पे क्या रक्खा है

शाज़ तमकनत

ज़ख़्म सीने का फिर उभर आया

शायान क़ुरैशी

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