फूल Poetry (page 41)

मुझ से बिछड़ के ख़ुश रहते हो

बशीर बद्र

मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई

बशीर बद्र

मेरी आँखों में तिरे प्यार का आँसू आए

बशीर बद्र

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे

बशीर बद्र

मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा

बशीर बद्र

मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा

बशीर बद्र

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ

बशीर बद्र

किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते

बशीर बद्र

कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी

बशीर बद्र

ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे

बशीर बद्र

चमक रही है परों में उड़ान की ख़ुशबू

बशीर बद्र

बड़े ताजिरों की सताई हुई

बशीर बद्र

अज़्मतें सब तिरी ख़ुदाई की

बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

बशीर बद्र

पता नहीं वो कौन था

बशर नवाज़

ना-रसा

बशर नवाज़

मुझे जीना नहीं आता

बशर नवाज़

चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो

बशर नवाज़

बाज़ार-ए-ज़िंदगी में जमे कैसे अपना रंग

बशर नवाज़

तारे दर्द के झोंके बन कर आते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

अपनी धूप में भी कुछ जल

बाक़ी सिद्दीक़ी

सामने सब के न बोलेंगे हमारा क्या है

बाक़ी अहमदपुरी

सुबुक-सरी में भी अंदेशा-ए-हवा रखना

बाक़र नक़वी

पग पग फूल खिले थे लेकिन तन-मन में थी आग

बाक़र नक़वी

दवा बग़ैर कोई तिफ़्ल मर गया तो क्या हुआ

बाक़र नक़वी

इश्क़ की सारी बातें ऐ दिल पागल-पन की बातें हैं

बाक़र मेहदी

बदल के रख देंगे ये तसव्वुर कि आदमी का वक़ार क्या है

बाक़र मेहदी

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