फूल Poetry (page 39)

मैं नफ़ी में

दानियाल तरीर

रंग और नूर की तमसील से होगा कि नहीं

दानियाल तरीर

एक बुझाओ एक जलाओ ख़्वाब का क्या है

दानियाल तरीर

बिला-जवाज़ नहीं है फ़लक से जंग मिरी

दानियाल तरीर

उज़्र उन की ज़बान से निकला

दाग़ देहलवी

खुलता नहीं है राज़ हमारे बयान से

दाग़ देहलवी

दिल-ए-नाकाम के हैं काम ख़राब

दाग़ देहलवी

गुनगुनाती हुई आवाज़ कहाँ से लाऊँ

चरख़ चिन्योटी

अक़्ल हैरान है रहमत का तक़ाज़ा क्या है

चरख़ चिन्योटी

सर उठा के मत चलिए आज के ज़माने में

चरण सिंह बशर

ये मोहब्बत जो मोहब्बत से कमाई हुई है

चाँदनी पांडे

हर आरज़ू में रंग है बाग़-ओ-बहार का

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

दिलकशी नाम को भी आलम-ए-इम्काँ में नहीं

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

रामायण का एक सीन

चकबस्त ब्रिज नारायण

मर्सिया गोपाल कृष्ण गोखले

चकबस्त ब्रिज नारायण

हमारा वतन दिल से प्यारा वतन

चकबस्त ब्रिज नारायण

सवाद-ए-शाम से डरता हुआ नज़र आया

बुशरा ज़ैदी

जब आया ईद का दिन घर में बेबसी की तरह

बिस्मिल साबरी

सहर हुई तो ख़यालों ने मुझ को घेर लिया

बिस्मिल साबरी

ख़िज़ाँ के जाने से हो या बहार आने से

बिस्मिल अज़ीमाबादी

ज़ब्त-ए-नाला दिल-ए-फ़िगार न कर

बिर्ज लाल रअना

जिस की हर बात में क़हक़हा जज़्ब था मैं न था दोस्तो

बिमल कृष्ण अश्क

हम से भली चाल चली चाँदनी

बिमल कृष्ण अश्क

चाँद को रेशमी बादल से उलझता देखूँ

बिमल कृष्ण अश्क

ऐसे में रोज़ रोज़ कोई ढूँडता मुझे

बिमल कृष्ण अश्क

ज़ख़्म को फूल कहें नौहे को नग़्मा समझें

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

काँटे हों या फूल अकेले चुनना होगा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

रहे न एक भी बेदाद-गर सितम बाक़ी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

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