रंग Poetry (page 20)

जिस तरफ़ जाऊँ उधर आलम-ए-तन्हाई है

शाज़ तमकनत

बना हुस्न-ए-तकल्लुम हुस्न-ए-ज़न आहिस्ता आहिस्ता

शाज़ तमकनत

ज़माना याद रक्खेगा तुम्हें ये काम कर जाना

शायान क़ुरैशी

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

बात हो दैर-ओ-हरम की या वतन की बात हो

शायान क़ुरैशी

फ़रियाद और तुझ को सितमगर कहे बग़ैर

शौक़ क़िदवाई

दिल खोटा है हम को उस से राज़-ए-इश्क़ न कहना था

शौक़ क़िदवाई

भागे अच्छी शक्लों वाले इश्क़ है गोया काम बुरा

शौक़ क़िदवाई

बाक़ी न रहे होश जुनूँ ऐसा हुआ तेज़

शौक़ माहरी

शैख़ ओ बरहमन दोनों हैं बर-हक़ दोनों का हर काम मुनासिब

शौक़ बहराइची

किया जो ए'तिबार उन पर मरीज़-ए-शाम-ए-हिज्राँ ने

शौक़ बहराइची

अक़्ल की कुछ कम नहीं है रहबरी मेरे लिए

शौक़ बहराइची

उस के नाम

शौकत परदेसी

हसरतें बन कर निगाहों से बरस जाएँगे हम

शौकत परदेसी

एक आसेब का साया था जो सर से उतरा

शौकत काज़मी

किसी ताँगे में फिर सामान रक्खा जा रहा है

शारिक़ कैफ़ी

जन्नत से दूर

शारिक़ कैफ़ी

ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो

शारिक़ कैफ़ी

ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है

शारिक़ कैफ़ी

कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए

शारिक़ कैफ़ी

इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने

शारिक़ कैफ़ी

जो बुझ सके न कभी दिल में है वो आग भरी

शारिक़ ईरायानी

कितने नाज़ुक कितने ख़ुश-गुल फूलों से ख़ुश-रंग प्याले

शरीफ़ कुंजाही

गर दर-ए-हर्फ़-ए-सदाक़त ये नहीं था फिर क्यूँ

शारिब मौरान्वी

तीन शामों की एक शाम

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

सब्ज़ सूरज की किरन

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मन अरफ़ा नफ़्सहू

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

बयान सफ़ाई

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मौसम-ए-संग-ओ-रंग से रब्त-ए-शरार किस को था

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

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