रंग Poetry (page 28)

अपनी तलब का नाम डुबोने क्यूँ जाएँ मय-ख़ाने तक

शायर लखनवी

उम्मीद के उफ़ुक़ से न उट्ठा ग़ुबार तक

शानुल हक़ हक़्क़ी

नज़र चुरा गए इज़हार-ए-मुद्दआ से मिरे

शानुल हक़ हक़्क़ी

है अब की फ़स्ल में रंग बहार और ही कुछ

शानुल हक़ हक़्क़ी

औरत

शाद आरफ़ी

मयस्सर जिन की नज़रों को तिरे गेसू के साए हैं

शाद आरफ़ी

कहता है बाग़बान लिहाज़ा न चाहिए

शाद आरफ़ी

हुदूद-ए-अक्ल-ओ-शर्ब का सवाल ही नहीं रहा

शाद आरफ़ी

चमन को आग लगाने की बात करता हूँ

शाद आरफ़ी

अहद-ए-मायूसी जहाँ तक साज़गार आता गया

शाद आरफ़ी

वाक़िफ़ हैं ख़ू-ए-यार से देखे चलन तमाम

सीमाब ज़फ़र

खोट की माला झूट जटाएँ अपने अपने ध्यान

सीमाब ज़फ़र

ख़िरद के जुमला दसातीर से मुकरते हुए

सीमाब ज़फ़र

फ़िराक़-मौसम के आसमाँ में उजाड़ तारे जुड़े हुए हैं

सीमाब ज़फ़र

मैं तोड़ूँ अहद-ओ-पैमान-ए-वफ़ा ये हो नहीं सकता

सीमाब बटालवी

वो जब रंग-ए-परेशानी को ख़ल्वत-गीर देखेंगे

सीमाब अकबराबादी

मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा

सीमाब अकबराबादी

जहान-ए-रंग-ओ-बू में मुस्तक़िल तख़्लीक़-ए-मस्ती है

सीमाब अकबराबादी

आओ फिर गर्मी दयार-ए-इश्क़ में पैदा करें

सीमाब अकबराबादी

बदल के भेस वो चेहरा कहाँ कहाँ न मिला

सय्यद एहतिशाम हुसैन

हर्फ़-ए-आग़ाज़-ए-सदा-ए-कुन-फ़काँ था और मैं

सय्यद नसीर शाह

सर-ब-सर बदला हुआ देखा था कल यार का रंग

सावन शुक्ला

मस्त-ए-सहर ओ तौबा-कुनाँ शाम का हूँ मैं

मोहम्मद रफ़ी सौदा

मक़्दूर नहीं उस की तजल्ली के बयाँ का

मोहम्मद रफ़ी सौदा

जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हिन्दू हैं बुत-परस्त मुसलमाँ ख़ुदा-परस्त

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को

सऊद उस्मानी

ख़ून-ए-दिल से रह-ए-हस्ती को फ़रोज़ाँ कर लें

सत्यपाल जाँबाज़

कैसी है ये बहार मुक़द्दर की बात है

सत्यपाल जाँबाज़

हमारे दिल में मचलेगी किसी की आरज़ू कब तक

सत्यपाल जाँबाज़

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