रंग Poetry (page 36)

मिरे ध्यान में है इक महल कहीं चौबारों का

साबिर वसीम

खिले हुए हैं फूल सितारे दरिया के उस पार

साबिर वसीम

खेल रचाया उस ने सारा वर्ना फिर क्यूँ होता मैं

साबिर वसीम

जो ख़्वाब मेरे नहीं थे मैं उन को देखता था

साबिर वसीम

इक शक्ल बे-इरादा सर-ए-बाम आ गई

साबिर वसीम

असीर-ए-शाम हैं ढलते दिखाई देते हैं

साबिर वसीम

अजनबी

साबिर दत्त

हैरान हूँ दो आँखों से क्या देख रहा हूँ

साबिर दत्त

'बद्र' यूँ तो सभी से मिलता है

साबिर बद्र जाफ़री

जो बू-ए-ज़िंदगी मुझे किरन किरन से आई है

साबिर आफ़ाक़ी

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशिर से रहते हैं

साबिर

ये दिल की दास्तान है कि दिल ग़ुलाम कर दिया

सबीहा सबा, पाकिस्तान

इक तिरी याद से यादों के ख़ज़ाने निकले

सबीहा सबा, पाकिस्तान

अदाकार चेहरे

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

जहाँ में जिस की शोहरत कू-ब-कू है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

शाख़ों पर जब पत्ते हिलने लगते हैं

सबा नुसरत

क़लम से राब्ता-ए-रंग-ओ-आब टूट गया

सबा नक़वी

नया शगूफ़ा इशारा-ए-यार पर खिला है

सबा नक़वी

उजाला कर के ज़ुल्मत में घिरा हूँ

सबा अकबराबादी

मंज़िल पे पहुँचने का मुझे शौक़ हुआ तेज़

सबा अकबराबादी

इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है

सबा अकबराबादी

हुस्न जो रंग ख़िज़ाँ में है वो पहचान गया

सबा अकबराबादी

ग़ालिबन मेरे अलावा कोई गुज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

सामने उन को पाया तो हम खो गए आज फिर हसरत-ए-गुफ़्तुगू रह गई

सबा अफ़ग़ानी

सुना भी कभी माजरा दर्द-ओ-ग़म का किसी दिल-जले की ज़बानी कहो तो

साइल देहलवी

बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में

साइल देहलवी

हम कि चेहरे पे न लाए कभी वीरानी को

सादुल्लाह शाह

ये मत भुला कि यहाँ जिस क़दर उजाले हैं

सअादत बाँदवी

पुर-हौल ख़राबों से शनासाई मिरी है

रूही कंजाही

हज़ार रंग जलाल-ओ-जमाल के देखे

रूही कंजाही

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