रंग Poetry (page 39)

शायद अब रूदाद-ए-हुनर में ऐसे बाब लिखे जाएँगे

राज़ी अख्तर शौक़

रंग अब यूँ तिरी तस्वीर में भरता जाऊँ

राज़ी अख्तर शौक़

मैं जब भी क़त्ल हो कर देखता हूँ

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे कटे क़सीदा-गो हर्फ़-गरों के दरमियाँ

राज़ी अख्तर शौक़

कभी ख़ुर्शीद-ए-ज़िया-बार हूँ मैं

राज़ी अख्तर शौक़

हम जहाँ नग़्मा-ओ-आहंग लिए फिरते हैं

राज़ी अख्तर शौक़

दस्तक सी ये क्या थी कोई साया है कि मैं हूँ

राज़ी अख्तर शौक़

छेड़ के साज़-ए-ज़रगरी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है रक़्स में

राज़ी अख्तर शौक़

आए हम शहर-ए-ग़ज़ल में तो इस आग़ाज़ के साथ

राज़ी अख्तर शौक़

ये किस दयार के हैं किस के ख़ानदान से हैं

रज़ा मौरान्वी

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता

रज़ा लखनवी

क्या पूछते हो मुझ को मोहब्बत में क्या मिला

रज़ा जौनपुरी

कैफ़ नसीब अब कहाँ ग़ुंचों के भी जमाल में

रज़ा जौनपुरी

ख़राब-ए-इश्क़ सही आलम-ए-शुहूद में हूँ

रज़ा हमदानी

जुनूँ का राज़ मोहब्बत का भेद पा न सकी

रज़ा हमदानी

उस चश्म ने कि तूतियों को नुक्ता-दाँ किया

रज़ा अज़ीमाबादी

हर नफ़स मूरिद-ए-सफ़र हैं हम

रज़ा अज़ीमाबादी

गुल-ए-उश्शाक़ रंग-ए-बाख़्ता है

रज़ा अज़ीमाबादी

बुतों को फ़ाएदा क्या है जो हम से जंग करते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

उम्र-ए-अबद से ख़िज़्र को बे-ज़ार देख कर

रविश सिद्दीक़ी

शिकस्त-ए-रंग-ए-तमन्ना को अर्ज़-ए-हाल कहूँ

रविश सिद्दीक़ी

पशेमाँ हैं तर्क-ए-मोहब्बत के बा'द

रविश सिद्दीक़ी

ख़िरद को गुमशुदा-ए-कू-ब-कू समझते हैं

रविश सिद्दीक़ी

कहने को सब फ़साना-ए-ग़ैब-ओ-शुहूद था

रविश सिद्दीक़ी

चला है ले के मुझे ज़ौक़-ए-जुस्तुजू मेरा

रविश सिद्दीक़ी

बादा-ए-गुल को सब अंदोह-रुबा कहते हैं

रविश सिद्दीक़ी

उन के जाने से ये दिल में हुई सूरत पैदा

रौनक़ टोंकवी

नुस्ख़े में तबीबों ने लिखा और ही कुछ है

रौनक़ टोंकवी

न बातें कीं न तस्कीं दी न पहलू में ज़रा ठहरे

रौनक़ टोंकवी

क्या देखते हैं आप झिजक कर शराब में

रौनक़ टोंकवी

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