रंग Poetry (page 93)

रुख़्सत-ए-शब का समाँ पहले कभी देखा न था

अहमद मुश्ताक़

रात फिर रंग पे थी उस के बदन की ख़ुशबू

अहमद मुश्ताक़

पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है

अहमद मुश्ताक़

लाग़र हैं जिस्म रंग हैं काले पड़े हुए

अहमद मुश्ताक़

किस झुटपुटे के रंग उजालों में आ गए

अहमद मुश्ताक़

ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं

अहमद मुश्ताक़

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी

अहमद मुश्ताक़

दिल में वो शोर न आँखों में वो नम रहता है

अहमद मुश्ताक़

बरस कर खुल गया अब्र-ए-ख़िज़ाँ आहिस्ता आहिस्ता

अहमद मुश्ताक़

बहुत रुक रुक के चलती है हवा ख़ाली मकानों में

अहमद मुश्ताक़

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए

अहमद मुश्ताक़

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए

अहमद मुश्ताक़

ये कैसा ख़ूँ है कि बह रहा है न जम रहा है

अहमद महफ़ूज़

वो इक सवाल-ए-सितारा कि आसमान में था

अहमद महफ़ूज़

उन आँखों में रंग-ए-मय नहीं है

अहमद महफ़ूज़

सवाद-ए-शाम न रंग-ए-सहर को देखते हैं

अहमद महफ़ूज़

नहीं आसमाँ तिरी चाल में नहीं आऊँगा

अहमद महफ़ूज़

मैं बंद आँखों से कब तलक ये ग़ुबार देखूँ

अहमद महफ़ूज़

लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का

अहमद महफ़ूज़

बदन-सराब न दरिया-ए-जाँ से मिलता है

अहमद महफ़ूज़

अब इस मकाँ में नया कोई दर नहीं करना

अहमद महफ़ूज़

क़यामत से क़यामत से गुज़ारे जा रहे थे

अहमद ख़याल

मैं वहशत-ओ-जुनूँ में तमाशा नहीं बना

अहमद ख़याल

कोई अन-देखी फ़ज़ा तस्वीर करना चाहिए

अहमद ख़याल

जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया

अहमद ख़याल

हर एक रंग धनक की मिसाल ऐसा था

अहमद ख़याल

फ़लक के रंग ज़मीं पर उतारता हुआ मैं

अहमद ख़याल

दश्त ओ जुनूँ का सिलसिला मेरे लहू में आ गया

अहमद ख़याल

बस्ती से चंद रोज़ किनारा करूँगा मैं

अहमद ख़याल

मैं रंग-ए-आसमाँ कर के सुनहरी छोड़ देता हूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

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