सबसे Poetry (page 37)

दम-ए-ता'मीर तख़रीब-ए-जहाँ कुछ और कहती है

शायर फतहपुरी

फिर उसी बुत से मोहब्बत चुप रहो

शादाब उल्फ़त

कर के सागर ने किनारे मुस्तरद

शादाब उल्फ़त

अब ज़मीन-ओ-आसमाँ के सब किनारों से अलग

शादाब उल्फ़त

गले लगाए रहा सब का ध्यान था इतना

शाद शाद नूही

सदा रंग-ए-मीना चमकता रहा

शाद लखनवी

क़ौल उस दरोग़-गो का कोई भी सच हुआ है

शाद लखनवी

ख़त देखिए दीदार की सूझी ये नई है

शाद लखनवी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

जिस के हम बीमार हैं ग़म ने उसे भी राँदा है

शाद लखनवी

ख़्वाह मुफ़्लिसी से निकल गया या तवंगरी से निकल गया

शाद बिलगवी

क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक

शाद अज़ीमाबादी

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा

शाद अज़ीमाबादी

कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था

शाद अज़ीमाबादी

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का

शाद अज़ीमाबादी

ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया

शाद अज़ीमाबादी

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर-आरज़ू था

शाद अज़ीमाबादी

अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा

शाद अज़ीमाबादी

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया

शाद अज़ीमाबादी

ज़ौक़-ए-नज़र को इज़्न-ए-नज़ारा न मिल सका

शबनम शकील

ये सिलसिले भी रिफ़ाक़त के कुछ अजीब से हैं

शबनम शकील

सिमट न पाए कि हर-सू बिखर गए थे हम

शबनम शकील

सामने इक बे-रहम हक़ीक़त नंगी हो कर नाचती है

शबनम शकील

सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी

शबनम शकील

हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं

शबनम शकील

हैं मनाज़िर सब बहम-पर्दा नज़र बाक़ी नहीं

शबनम शकील

दोस्तों का ज़िक्र क्या दुश्मन हैं जब बदले हुए

शबनम शकील

दर आया अंधेरा आँखों में और सब मंज़र धुँदलाए हैं

शबनम शकील

यही सुलूक मुनासिब है ख़ुश-गुमानों से

शबनम रूमानी

कीजिए और सवालात न ज़ाती मुझ से

शबनम रूमानी

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