यात्रा Poetry (page 69)

दश्त-ए-उम्मीद में ख़्वाबों का सफ़र करना था

अहमद शनास

आईना बन के अपना तमाशा दिखाएँ हम

अहमद शहरयार

जब तक ग़ुबार-ए-राह मिरा हम-सफ़र रहा

अहमद शाहिद ख़ाँ

ग़म के बादल हैं ये ढल जाएँगे रफ़्ता रफ़्ता

अहमद शाहिद ख़ाँ

फ़ड़फ़ड़ाता हुआ परिंदा है

अहमद सज्जाद बाबर

कब से मैं सफ़र में हूँ मगर ये नहीं मा'लूम

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

गर्द की तरह सर-ए-राहगुज़र बैठे हैं

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

हैं शाख़ शाख़ परेशाँ तमाम घर मेरे

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

इक ख़्वाब है ये प्यास भी दरिया भी ख़्वाब है

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

मुझे ये क्या पड़ी है कौन मेरा हम-सफ़र होगा

अहमद रिज़वान

मैं ख़ाक हो रहा हूँ यहाँ ख़ाक-दान में

अहमद रिज़वान

किसी को छोड़ देता हूँ किसी के साथ चलता हूँ

अहमद रिज़वान

आँखें बनाता दश्त की वुसअत को देखता

अहमद रिज़वान

जिन्हें रास आ गए हैं ये सहर-नुमा अँधेरे

अहमद राही

अजब तज़ाद में काटा है ज़िंदगी का सफ़र

अहमद नदीम क़ासमी

रूह लबों तक आ कर सोचे

अहमद नदीम क़ासमी

महफ़िल-ए-शब

अहमद नदीम क़ासमी

बीसवीं सदी का इंसान

अहमद नदीम क़ासमी

खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

अहमद नदीम क़ासमी

जब भी आँखों में तिरी रुख़्सत का मंज़र आ गया

अहमद नदीम क़ासमी

हम उन के नक़्श-ए-क़दम ही को जादा करते रहे

अहमद नदीम क़ासमी

होता नहीं ज़ौक़-ए-ज़िंदगी कम

अहमद नदीम क़ासमी

हमेशा ज़ुल्म के मंज़र हमें दिखाए गए

अहमद नदीम क़ासमी

दुख के सफ़र पे दिल को रवाना तो कर दिया

अहमद मुश्ताक़

टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया

अहमद मुश्ताक़

पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है

अहमद मुश्ताक़

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी

अहमद मुश्ताक़

इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम

अहमद मुश्ताक़

अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम

अहमद मुश्ताक़

वो इक सवाल-ए-सितारा कि आसमान में था

अहमद महफ़ूज़

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