सामने Poetry (page 7)

हमारे दर्द की जानिब इशारा करती हैं

शहपर रसूल

ज़ाविए फ़िक्र के अब और बनाओ यारो

शौक़ सालकी

जफ़ा पे शुक्र का उम्मीद-वार क्यूँ आया

शौक़ क़िदवाई

दिल मिरा टूटा तो उस को कुछ मलाल आ ही गया

शौक़ क़िदवाई

मौत का फ़रिश्ता

शौकत आबिदी

कुतिया

शारिक़ कैफ़ी

अधूरा जिस्म लिए पीछे हट रहा हूँ मैं

शारिक़ जमाल

हवा के दोश पे बादल की मुश्क ख़ाली है

शारिब मौरान्वी

जो बात दिल में थी काग़ज़ पे कब वो आई है

शरीफ़ मुनव्वर

किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या

शम्स तबरेज़ी

वजूद-ए-बर्क़ ज़रूरी है गुलिस्ताँ के लिए

शम्स इटावी

इस इल्तिफ़ात पर कोई दामन न थाम ले

शमीम जयपुरी

हर शय तुझी को सामने लाए तो क्या करूँ

शमीम जयपुरी

तेरे नालों से कोई बदनाम होता जाएगा

शाकिर कलकत्तवी

तेरी नज़र के सामने ये दिल नहीं रहा

शकील शम्सी

ज़ौक़-ए-गुनाह ओ अज़्म-ए-पशेमाँ लिए हुए

शकील बदायुनी

पैहम तलाश-ए-दोस्त मैं करता चला गया

शकील बदायुनी

नसीब दर पे तिरे आज़माने आया हूँ

शकील बदायुनी

ला रहा है मय कोई शीशे में भर के सामने

शकील बदायुनी

हर गोशा-ए-नज़र में समाए हुए हो तुम

शकील बदायुनी

दिल मरकज़-ए-हिजाब बनाया न जाएगा

शकील बदायुनी

बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी है

शकील बदायुनी

बेकार गई आड़ तिरे पर्दा-ए-दर की

शकील बदायुनी

रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ

शकेब जलाली

वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ

शकेब जलाली

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख

शकेब जलाली

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में

शकेब जलाली

दामन-ए-ज़ब्त को अश्कों में भिगो लेता हूँ

शकेब बनारसी

ख़ूनीं गुलाब सब्ज़ सनोबर है सामने

शकेब अयाज़

कब सुनी तुम ने रागनी मेरी

शाइस्ता सहर

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