सन्नाटा Poetry (page 6)

कितने मौसम सरगर्दां थे मुझ से हाथ मिलाने में

अज़्म बहज़ाद

एक सन्नाटा था आवाज़ न थी और न जवाब

अज़ीज़ तमन्नाई

दिल में वो दर्द उठा रात कि हम सो न सके

अज़ीज़ तमन्नाई

रफ़्तगाँ

अज़ीज़ क़ैसी

हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है

अज़ीज़ क़ैसी

दरीचे सो गए शब जागती है

अज़हर नैयर

मयस्सर हो जो लम्हा देखने को

अज़हर इनायती

महरूमी के दुख और तन्हाई के रंज उठाए

अज़ीम मुर्तज़ा

किन आवाज़ों का सन्नाटा मुझ में है

अय्यूब ख़ावर

चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत

अतीक़ इलाहाबादी

जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था

असलम कोलसरी

ज़हर

असलम आज़ाद

आहट

असलम आज़ाद

हर सू है तारीकी छाई तुम भी चुप और हम भी चुप

असलम आज़ाद

ख़ाली बैठे क्यूँ दिन काटें आओ रे जी इक काम करें

आरज़ू लखनवी

दिखाती है जो ये दुनिया वो बैठा देखता हूँ मैं

अरशद जमाल 'सारिम'

आज की तारीख़ में इंसाँ मुकम्मल कौन है

आराधना प्रसाद

छत पर बारिश बरस रही है

अनवर ख़ान

उदासी एक लड़की है

अनवार फ़ितरत

खिला है फूल बहुत रोज़ में मुक़द्दर का

अनवर अंजुम

इतना सन्नाटा है कुछ बोलते डर लगता है

अनवर महमूद खालिद

शहर-दर-शहर फ़ज़ाओं में धुआँ है अब के

अनवर महमूद खालिद

नज़्म

अमीताभ बच्चन

नक़्श पानी पे बना हो जैसे

अमीर क़ज़लबाश

बंद आँखों से वो मंज़र देखूँ

अमीर क़ज़लबाश

आज की रात भी गुज़री है मिरी कल की तरह

अमीर क़ज़लबाश

शहर में सारे चराग़ों की ज़िया ख़ामोश है

अमीर इमाम

मेरा कर्ब मिरी तन्हाई की ज़ीनत

अम्बर बहराईची

एक सन्नाटा बिछा है इस जहाँ में हर तरफ़

अम्बर बहराईची

गीली मिट्टी हाथ में ले कर बैठा हूँ

अम्बर बहराईची

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