रात Poetry (page 42)

सदियों से मैं इस आँख की पुतली में छुपा था

रशीद क़ैसरानी

सदियों से मैं इस आँख की पुतली में छुपा था

रशीद क़ैसरानी

पानी की तरह रेत के सीने में उतर जा

रशीद क़ैसरानी

माना वो एक ख़्वाब था धोका नज़र का था

रशीद क़ैसरानी

माना वो एक ख़्वाब था धोका नज़र का था

रशीद क़ैसरानी

मैं ने कहीं थीं आप से बातें भली भली

रशीद क़ैसरानी

गुम्बद-ए-ज़ात में अब कोई सदा दूँ तो चलूँ

रशीद क़ैसरानी

दम-भर की ख़ुशी बाइस-ए-आज़ार भी होगी

रशीद क़ैसरानी

दम भर की ख़ुशी बाइस-ए-आज़ार भी होगी

रशीद क़ैसरानी

आया उफ़ुक़ की सेज तक आ कर पलट गया

रशीद क़ैसरानी

नहीं था ज़ख़्म तो आँसू कोई सजा लेता

रशीद निसार

वस्ल के दिन का इशारा है कि ढल जाऊँगा

रशीद लखनवी

उक़्दे उल्फ़त के सब ऐ रश्क-ए-क़मर खोल दिए

रशीद लखनवी

ठहर जावेद के अरमाँ दिल-ए-मुज़्तर निकलते हैं

रशीद लखनवी

राज़ उल्फ़त के अयाँ रात को सारे होते

रशीद लखनवी

जो मुझे मर्ग़ूब हो वो सोगवारी चाहिए

रशीद लखनवी

है अंधेरा तो समझता हूँ शब-ए-गेसू है

रशीद लखनवी

गर्म रफ़्तार है तेरी ये पता देते हैं

रशीद लखनवी

दम-ए-रफ़्तार-ए-जानाँ ये सदा-ए-नाज़ आती है

रशीद लखनवी

अगर गुल की कोई पती झड़ी है

रशीद लखनवी

हुस्न क्या जिस को किसी हुस्न से ख़तरा न हुआ

रशीद कौसर फ़ारूक़ी

गए दिनों की मुसाफ़िरत का ब-यक-क़लम इश्तिहार लिखना

रशीद एजाज़

यूँ गँवाता है कोई जान-ए-अज़ीज़

रसा चुग़ताई

रात हम ने जहाँ बसर की है

रसा चुग़ताई

कहाँ जाते हैं आगे शहर-ए-जाँ से

रसा चुग़ताई

हम ने तो इस इश्क़ में यारो खींचे हैं आज़ार बहुत

रसा चुग़ताई

रोता हमें जो देखा दिल उस का पिघल गया

रंजूर अज़ीमाबादी

ता हश्र रहे ये दाग़ दिल का

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

ज़िंदगी मुझ को कहाँ ले आई है

रमज़ान अली सहर

निगाह तूर पे है और जमाल सीने में

रम्ज़ अज़ीमाबादी

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