रात Poetry (page 40)
मोहब्बत में वफ़ा वालों को कब ईज़ा सताती है
रिफ़अत सेठी
मासूम ख़्वाहिशों की पशीमानियों में था
रियाज़ मजीद
हो गया है एक इक पल काटना भारी मुझे
रियाज़ मजीद
ज़ियादा पास मत आना
रहमान फ़ारिस
जागती आँखों का ख़्वाब
रहमान फ़ारिस
नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है
रहमान फ़ारिस
तख़्लीक़ किसे कहते हैं है अज़्मत-ए-फ़न क्या
रहबर जौनपूरी
शब का सफ़र
रज़ी रज़ीउद्दीन
बुढ़ापा
रज़ी रज़ीउद्दीन
क़ल्ब-ओ-जिगर के दाग़ फ़रोज़ाँ किए हुए
रज़ी रज़ीउद्दीन
वो तमाम रंग अना के थे वो उमंग सारी लहू से थी
राज़ी अख्तर शौक़
वो शाख़-ए-गुल की तरह मौसम-ए-तरब की तरह
राज़ी अख्तर शौक़
सफ़र कठिन ही सही क्या अजब था साथ उस का
राज़ी अख्तर शौक़
जिस पल मैं ने घर की इमारत ख़्वाब-आसार बनाई थी
राज़ी अख्तर शौक़
बिछड़ते वक़्त तो कुछ उस में ग़म-गुसारी थी
राज़ी अख्तर शौक़
मुहक़क़िक़
रज़ा नक़वी वाही
ज़िंदगी अब इस क़दर सफ़्फ़ाक हो जाएगी क्या
रज़ा मौरान्वी
ये बात तिरी चश्म-ए-फुसूँ-कार ही समझे
रज़ा जौनपुरी
क्या पूछते हो मुझ को मोहब्बत में क्या मिला
रज़ा जौनपुरी
दिल को मामूर करो जज़्ब-ओ-असर से पहले
रज़ा जौनपुरी
ये किस मक़ाम पे ठहरा है कारवान-ए-वफ़ा
रज़ा हमदानी
सहरा-ए-ख़याल का दिया हूँ
रज़ा हमदानी
जुनूँ का राज़ मोहब्बत का भेद पा न सकी
रज़ा हमदानी
है ग़नीमत ये फ़रेब-ए-शब-ए-व'अदा ऐ दिल
रज़ा हमदानी
अश्क यूँ बहते हैं सावन की झड़ी हो जैसे
रज़ा हमदानी
शर्मिंदा नहीं कौन तिरी इश्वा-गरी का
रज़ा अज़ीमाबादी
सवाद-ए-शहर में थोड़ी सी ये जो जन्नत है
रज़ा अश्क
दिल बता और क्या है होने को
रज़ा अमरोही
नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं
रविश सिद्दीक़ी
उम्र-ए-अबद से ख़िज़्र को बे-ज़ार देख कर
रविश सिद्दीक़ी
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