रात Poetry (page 85)

तुम किसी संग पे अब सर को टिका कर सो जाओ

अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

बर-सर-ए-बाद हुआ अपना ठिकाना सर-ए-राह

अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

सर्द रातों की हवा में उड़ते पत्तों के मसील

अली अकबर नातिक़

ग़ुबार-ए-शहर में उसे न ढूँड जो ख़िज़ाँ की शब

अली अकबर नातिक़

चराग़ बाँटने वालों प हैरतें न करो

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-4

अली अकबर नातिक़

मुसीबत की ख़बरें

अली अकबर नातिक़

मिरे चराग़ बुझ गए

अली अकबर नातिक़

कँवल हों आब में ख़ुश गुल सबा में शाद रहें

अली अकबर नातिक़

हरीम-ए-दिल, कि सर-ब-सर जो रौशनी से भर गया

अली अकबर नातिक़

चाँदी वाले, शीशे वाले, आँखों वाले शहर में

अली अकबर नातिक़

जो ख़ुद को पाएँ तो फिर दूसरा तलाश करें

अली अकबर अब्बास

अपने नाख़ुन अपने चेहरे पर ख़राशें दे गए

अली अकबर अब्बास

अँधेरी शब का ये ख़्वाब-मंज़र मुझे उजालों से भर रहा है

अलीना इतरत

ये किस मुहिम पर चले थे हम जिस में रास्ते पुर-ख़तर न आए

अलीना इतरत

जुनूँ में दामन-ए-दिल गरचे तार तार हुआ

अलीना इतरत

वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए

आलमताब तिश्ना

शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा हूँ

आलमताब तिश्ना

किस किस से दोस्ती हुई ये ध्यान में नहीं

आलमताब तिश्ना

असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना

आलमताब तिश्ना

आइना-ख़ाना भी अंदोह-ए-तमन्ना निकला

आलमताब तिश्ना

कोई हुनर तो मिरी चश्म-ए-अश्क-बार में है

अकरम महमूद

अगर हर चीज़ में उस ने असर रक्खा हुआ है

अकरम महमूद

गुज़रते दौड़ते लम्हे हिसाब में लिखिए

अकमल इमाम

यादें

अख़्तर-उल-ईमान

तन्हाई में

अख़्तर-उल-ईमान

सब्ज़ा-ए-बेगाना

अख़्तर-उल-ईमान

एक लड़का

अख़्तर-उल-ईमान

आईना देखता हूँ

अख़्तर ज़ियाई

दिन ढला शब हुई चराग़ जले

अख़्तर ज़ियाई

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