शमा Poetry (page 23)

अगर काबा का रुख़ भी जानिब-ए-मय-ख़ाना हो जाए

बेदम शाह वारसी

तिरा कुश्ता उठाया अक़रबा ने

बयान यज़दानी

मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल

बयान मेरठी

ऐ जुनूँ हाथ के चलते ही मचल जाऊँगा

बयान मेरठी

ये ख़ूब-रू न छुरी ने कटार रखते हैं

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

जो ज़मीं पर फ़राग़ रखते हैं

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

हर तरफ़ सोज़ का अंदाज़ जुदागाना है

बासित भोपाली

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

बशर नवाज़

न कोई उन के सिवा और जान-ए-जाँ देखा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

शब-ए-फ़ुर्क़त नज़र आते नहीं आसार-ए-सहर

बर्क़ देहलवी

ताबिश-ए-हुस्न हिजाब-ए-रुख़-ए-पुर-नूर नहीं

बर्क़ देहलवी

देखा तो एक शो'ले से ऐ शैख़-ओ-बरहमन

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

यकसाँ लगें हैं उन को तो दैर-ओ-हरम बहम

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

क़ज़ा ने हाल-ए-गुल जब सफ़्हा-ए-तक़दीर पर लिक्खा

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

मत तंग हो करे जो फ़लक तुझ को तंग-दस्त

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

बहुत है एक नज़र

बाक़र मेहदी

इस दर्जा हुआ ख़ुश कि डरा दिल से बहुत मैं

बाक़र मेहदी

क्या फ़ाएदा है क़िस्सा-ए-रिज़वान से तुझे

बाक़र आगाह वेलोरी

रहता है ज़ुल्फ़-ए-यार मिरे मन से मन लगा

बाक़र आगाह वेलोरी

जो है याँ अासाइश-ए-रंज-ओ-मेहन में मस्त है

बहराम जी

हम न बुत-ख़ाने में ने मस्जिद-ए-वीराँ में रहे

बहराम जी

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

ज़फ़र

शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही

ज़फ़र

निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ

ज़फ़र

क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर

ज़फ़र

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