शायद Poetry (page 32)

ज़िक्र हम से बे-तलब का क्या तलबगारी के दिन

अब्दुल अहद साज़

हम अपने ज़ख़्म कुरेदते हैं वो ज़ख़्म पराए धोते थे

अब्दुल अहद साज़

हर इक धड़कन अजब आहट

अब्दुल अहद साज़

दिखाई देने के और दिखाई न देने के दरमियान सा कुछ

अब्दुल अहद साज़

मैं अपने आप में गहरा उतर गया शायद

अब्बास ताबिश

वो हँसती है तो उस के हाथ रोते हैं

अब्बास ताबिश

शायद किसी बला का था साया दरख़्त पर

अब्बास ताबिश

साँस के हम-राह शो'ले की लपक आने को है

अब्बास ताबिश

पस-ए-ग़ुबार मदद माँगते हैं पानी से

अब्बास ताबिश

निगाह-ए-अव्वलीं का है तक़ाज़ा देखते रहना

अब्बास ताबिश

अजीब तौर की है अब के सरगिरानी मिरी

अब्बास ताबिश

सदाएँ क़ैद करूँ आहटें चुरा ले जाऊँ

आशुफ़्ता चंगेज़ी

आँखों के सामने कोई मंज़र नया न था

आशुफ़्ता चंगेज़ी

ये और बात कि रंग-ए-बहार कम होगा

आनिस मुईन

जीवन को दुख दुख को आग और आग को पानी कहते

आनिस मुईन

हो जाएगी जब तुम से शनासाई ज़रा और

आनिस मुईन

बाहर भी अब अंदर जैसा सन्नाटा है

आनिस मुईन

वो जिएँ क्या जिन्हें जीने का हुनर भी न मिला

आल-ए-अहमद सूरूर

निगाहों में इक़रार सारे हुए हैं

आग़ा अकबराबादी

वहाँ शायद कोई बैठा हुआ है

आदिल रज़ा मंसूरी

वहाँ शायद कोई बैठा हुआ है

आदिल रज़ा मंसूरी

आँधियाँ ग़म की चलीं और कर्ब-बादल छा गए

अाबिदा उरूज

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