साँस के हम-राह शो'ले की लपक आने को है

साँस के हम-राह शो'ले की लपक आने को है

ऐसा लगता है कोई रौशन महक आने को है

फिर पस-ए-पस्पाई मेरा हौसला ज़िंदा हुआ

आसमाँ से फिर कोई ताज़ा कुमक आने को है

एक ख़िल्क़त ही नहीं है बद-गुमानी का शिकार

उस की जानिब से मिरे भी दिल में शक आने को है

एक मुद्दत से चराग़-ए-सर्द सा रक्खा हूँ मैं

इस तवक़्क़ो' पर कि आँचल की भड़क आने को है

ऐ सफ़र की राएगानी आयतों के साथ चल

फिर वही जंगल वही सूनी सड़क आने को है

बेद-ए-मजनूँ हो रहे हैं तीर क्या तलवार क्या

मेरे दुश्मन में भी अब शायद लचक आने को है

अब तो इस छत पर कोई माह-ए-शबाना चाहिए

साया-ए-क़ामत फ़सील-शाम तक आने को है

रास्ते गुम हो रहे हैं धुँद की पहनाई में

सर्दियों की शाम है फिर उस का चक आने को है

(1617) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554