मामला Poetry (page 11)
सू-ए-सहरा ही मुझे ले गई वहशत मेरी
श्याम सुंदर लाल बर्क़
ख़ुदाया हिन्द का रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर दे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
मुँह से जो मिलाइए किसी को
शऊर बलगिरामी
समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले
शुजा ख़ावर
ख़तीब-ए-आज़म (सय्यद अता-उल्लाह-बुख़ारी)
शोरिश काश्मीरी
साँस की आस निगहबाँ है ख़बर-दार रहो
शोहरत बुख़ारी
इक ज़माने से फ़लक ठहरा हुआ लगता है
शोहरत बुख़ारी
किसी नादीदा शय की चाह में अक्सर बदलते हैं
शोएब निज़ाम
दुनिया से दुनिया में रह कर कैसे किनारा कर रक्खा है
शोएब निज़ाम
हाए क्या हाल कर लिया दिल का
शमशाद शाद
हुआ जब जल्वा-आरा आप का ज़ौक़-ए-ख़ुद-आराई
शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी
इश्क़ में ऐसी करामात कहाँ थी पहले
शिव दयाल सहाब
वो झंकार पैदा है तार-ए-नफ़स में
शेर सिंह नाज़ देहलवी
दिखाने को नहीं हम मुज़्तरिब हालत ही ऐसी है
ज़ौक़
न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता
ज़ौक़
कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है
ज़ौक़
जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा
ज़ौक़
अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो
ज़ौक़
चाँदनी अपने साथ लाई है
शहज़ाद रज़ा लम्स
उस की बातें क्या करते हो वो लफ़्ज़ों का बानी था
शहपर रसूल
एक दिन न रोने का फ़ैसला किया मैं ने
शहपर रसूल
इश्क़ की मेरे जो शोहरत हो गई
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
इधर माइल कहाँ वो मह-जबीं है
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
गोर में याद-ए-क़द-ए-यार ने सोने न दिया
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
अब तो जिस रोज़ से रूठी है मोहब्बत उस की
शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी
गिरता हुआ दरख़्त
शीरीं अहमद
पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाए
शीन काफ़ निज़ाम
अब तेरे इंतिज़ार की आदत नहीं रही
शाज़िया अकबर
संग-आबाद की एक दुकाँ
शाज़ तमकनत
अजनबी
शाज़ तमकनत
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