मामला Poetry (page 38)

लाख कुछ न हम कहते बे-ज़बाँ रहे होते

चरण सिंह बशर

कैसा वो मौसम था ये तो समझ न पाए हम

चंद्र प्रकाश शाद

रामायण का एक सीन

चकबस्त ब्रिज नारायण

हुब्ब-ए-क़ौमी

चकबस्त ब्रिज नारायण

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता

चकबस्त ब्रिज नारायण

मैं जब ख़ुद से बिछड़ती हूँ

बुशरा एजाज़

इस क़दर बढ़ गई वहशत तिरे दीवाने की

बूम मेरठी

सारी उम्मीद रही जाती है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

कहाँ आया है दीवानों को तेरा कुछ क़रार अब तक

बिस्मिल अज़ीमाबादी

मिल चुका महफ़िल में अब लुत्फ़-ए-शकेबाई मुझे

बिस्मिल इलाहाबादी

प्यार है वो

बिमल कृष्ण अश्क

नज़्म

बिमल कृष्ण अश्क

लगा के नक़्ब किसी रोज़ मार सकते हैं

बिल्क़ीस ख़ान

कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है

भवेश दिलशाद

ग़ाफ़िल इतना हुस्न पे ग़र्रा ध्यान किधर है तौबा कर

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल मिरा तीर-ए-सितम-गर का निशाना हो गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

सब ने होंटों से लगा कर तोड़ डाला है मुझे

भारत भूषण पन्त

किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है

भारत भूषण पन्त

जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं

भारत भूषण पन्त

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

पछताओगे फिर हम से शरारत नहीं अच्छी

बेख़ुद देहलवी

न अरमाँ बन के आते हैं न हसरत बन के आते हैं

बेख़ुद देहलवी

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

ख़ुदा रक्खे तुझे मेरी बुराई देखने वाले

बेख़ुद देहलवी

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

लब पे है फ़रियाद अश्कों की रवानी हो चुकी

बहज़ाद लखनवी

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे

बहज़ाद लखनवी

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