मामला Poetry (page 40)

वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे

बशीर बद्र

प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी

बशीर बद्र

ख़ानदानी रिश्तों में अक्सर रक़ाबत है बहुत

बशीर बद्र

बड़े ताजिरों की सताई हुई

बशीर बद्र

अज़्मतें सब तिरी ख़ुदाई की

बशीर बद्र

हम बयाबानों में घूमे शहर की सड़कों पे टहले

बशीर मुंज़िर

हर रोज़ ही दिन भर के झमेलों से निमट के

बशीर मुंज़िर

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

हिन्द के जाँ-बाज़ सिपाही

बर्क़ देहलवी

दिल जो सूरत-गर-ए-मअ'नी का सनम-ख़ाना बने

बर्क़ देहलवी

वक़्त का पत्थर भारी होता जाता है

बाक़ी सिद्दीक़ी

उन का या अपना तमाशा देखो

बाक़ी सिद्दीक़ी

तारे दर्द के झोंके बन कर आते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल जिंस-ए-मोहब्बत का ख़रीदार नहीं है

बाक़ी सिद्दीक़ी

सिर्फ़ मौसम के बदलने ही पे मौक़ूफ़ नहीं

बक़ा बलूच

शायद

बलराज कोमल

सर्द, तारीक रात

बलराज कोमल

आइने में है फिर वही सूरत

बकुल देव

कम न होगी ये सरगिरानी क्या

बकुल देव

उसी के ज़ुल्म से मैं हालत-ए-पनाह में था

बख़्श लाइलपूरी

कोई शय दिल को बहलाती नहीं है

बख़्श लाइलपूरी

दीदा-ए-बे-रंग में ख़ूँ-रंग मंज़र रख दिए

बख़्श लाइलपूरी

कुफ़्र एक रंग-ए-क़ुदरत-ए-बे-इंतिहा में है

बहराम जी

बहस क्यूँ है काफ़िर-ओ-दीं-दार की

बहराम जी

ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई

ज़फ़र

वाँ इरादा आज उस क़ातिल के दिल में और है

ज़फ़र

काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दी

ज़फ़र

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में

ज़फ़र

यास की कोहर में लिपटा हुआ चेहरा देखा

बाग़ हुसैन कमाल

ज़हर पिए मदहोश अँधेरी रात

बदनाम नज़र

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