मांग Poetry (page 9)

यूँ ख़ाक की मानिंद न राहों पे बिखर जा

शहज़ाद अहमद

ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से

शहज़ाद अहमद

उम्र जितनी भी कटी उस के भरोसे पे कटी

शहज़ाद अहमद

तुझ पे जाँ देने को तय्यार कोई तो होगा

शहज़ाद अहमद

तेरे घर की भी वही दीवार थी दरवाज़ा था

शहज़ाद अहमद

सूरज की किरन देख के बेज़ार हुए हो

शहज़ाद अहमद

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया

शहज़ाद अहमद

जान मुक़द्दर में थी जान से प्यारा न था

शहज़ाद अहमद

घर जला लेता है ख़ुद अपने ही अनवार से तू

शहज़ाद अहमद

डूब जाएँगे सितारे और बिखर जाएगी रात

शहज़ाद अहमद

दिल का बुरा नहीं मगर शख़्स अजीब ढब का है

शहज़ाद अहमद

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की

शहज़ाद अहमद

या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है

शहरयार

ये इक शजर कि जिस पे न काँटा न फूल है

शहरयार

शहर-ए-जुनूँ में कल तलक जो भी था सब बदल गया

शहरयार

कब समाँ देखेंगे हम ज़ख़्मों के भर जाने का

शहरयार

जहाँ मैं होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा

शहरयार

बे-ताब हैं और इश्क़ का दावा नहीं हम को

शहरयार

अपने हमराह मोहब्बत के हवाले रखना

शाहिद फ़रीद

मोहब्बत मुझ से कहती थी ज़रा होश्यार दामन से

शाहिद भोपाली

मिज़ाज-ए-गर्दिश-ए-दौराँ वही समझते हैं

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

कुछ भी न जब दिखाई दे तब देखता हूँ मैं

शाहीन अब्बास

साअत-ए-आसूदगी देखे हुए अर्सा हुआ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

अब कहाँ ले के छुपें उर्यां बदन और तन जला

शहाब जाफ़री

तिरे दाँत सारे सफ़ेद हैं पए-ज़ेब पान से मल कर आ

शाह नसीर

जो ऐन वस्ल में आराम से नहीं वाक़िफ़

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

सदियों तुम्हारी याद में शमएँ जलाएँगे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

क़ुर्बत-ए-हुस्न में भी दर्द के आसार मिले

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

सवाल करता नहीं और जवाब उस की तलब

शफ़ीक़ सलीमी

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