मांग Poetry (page 8)

कभी मय-कदा कभी बुत-कदा कभी काबा तो कभी ख़ानक़ाह

शमीम अब्बास

बड़ी सर्द रात थी कल मगर बड़ी आँच थी बड़ा ताव था

शमीम अब्बास

गर्दिश में ज़हर भी है मुसलसल लहू के साथ

शकील जाज़िब

ख़ुश हूँ कि मिरा हुस्न-ए-तलब काम तो आया

शकील बदायुनी

बे-तअल्लुक़ तिरे आगे से गुज़र जाता है

शकील बदायुनी

बे-तअल्लुक़ तिरे आगे से गुज़र जाता है

शकील बदायुनी

ज़लज़ला

शकील बदायुनी

ज़ौक़-ए-गुनाह ओ अज़्म-ए-पशेमाँ लिए हुए

शकील बदायुनी

शायद आग़ाज़ हुआ फिर किसी अफ़्साने का

शकील बदायुनी

निगाह-ए-नाज़ का इक वार कर के छोड़ दिया

शकील बदायुनी

ख़ुश हूँ कि मिरा हुस्न-ए-तलब काम तो आया

शकील बदायुनी

करने दो अगर क़त्ताल-ए-जहाँ तलवार की बातें करते हैं

शकील बदायुनी

जो दिल पे गुज़रती है वो समझा नहीं सकते

शकील बदायुनी

जल्वा-ए-हुस्न-ए-करम का आसरा करता हूँ मैं

शकील बदायुनी

इक इक क़दम फ़रेब-ए-तमन्ना से बच के चल

शकील बदायुनी

जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया

शकेब जलाली

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत

शकेब जलाली

रौशन हैं दिल के दाग़ न आँखों के शब-चराग़

शकेब जलाली

अब आप रह-ए-दिल जो कुशादा नहीं रखते

शकेब जलाली

लगा लिया था गले उस ने बा-वफ़ा कह कर

शकेब अयाज़

किस सितमगर का गुनाहगार हूँ अल्लाह अल्लाह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कौन दिल है कि तिरे दर्द में बीमार नहीं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

एक मुद्दत से तलबगार हूँ किन का इन का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

याँ मुद्दई' अपना किसे ऐ यार न देखा

शैख़ मोहम्मद रोशन जोशिश लखनवी

इस दश्त की वुसअत में सिमट कर नहीं देखा

शहज़ाद क़मर

शौक़-ए-सफ़र बे-सबब और सफ़र बे-तलब

शहज़ाद अहमद

मंज़िल है कठिन दिल बहुत आराम-तलब है

शहज़ाद अहमद

इस क़दर तेज़ न चल साँस उखड़ जाएगा

शहज़ाद अहमद

दस बजे रात को सो जाते हैं ख़बरें सुन कर

शहज़ाद अहमद

आरज़ू की बे-हिसी का गर यही आलम रहा

शहज़ाद अहमद

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