तेग Poetry (page 15)

जब करें मुझ तिरे का ख़्याल अँखियाँ

अब्दुल वहाब यकरू

गुदाज़-ए-आतिश-ए-ग़म सीं हुई हैं बावली अँखियाँ

अब्दुल वहाब यकरू

पुर्सिश है चश्म-ए-अश्क-फ़शाँ पर न आए हर्फ़

अब्दुल मन्नान तरज़ी

एक क़दम तेग़ पे और एक शरर पर रक्खा

अब्बास ताबिश

सारे आलम में तेरी ख़ुशबू है

आसी ग़ाज़ीपुरी

कुछ कहूँ कहना जो मेरा कीजिए

आसी ग़ाज़ीपुरी

ज़ंजीर से जुनूँ की ख़लिश कम न हो सकी

आल-ए-अहमद सूरूर

ख़ुदा-परस्त मिले और न बुत-परस्त मिले

आल-ए-अहमद सूरूर

रक़ीब क़त्ल हुआ उस की तेग़-ए-अबरू से

आग़ा अकबराबादी

वो कहते हैं उट्ठो सहर हो गई

आग़ा अकबराबादी

तिरे जलाल से ख़ुर्शीद को ज़वाल हुआ

आग़ा अकबराबादी

जीते-जी के आश्ना हैं फिर किसी का कौन है

आग़ा अकबराबादी

दीवाली

आफ़ताब राईस पानीपती

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