घाव Poetry (page 41)

काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे

अबु मोहम्मद सहर

कमाँ हुआ है क़द अबरू के गोशा-गीरों का

आबरू शाह मुबारक

देख तू बे-रहम आशिक़ नीं तुझे छोड़ा नहीं

आबरू शाह मुबारक

ये दाग़-ए-इश्क़ जो मिटता भी है चमकता भी है

अबरार अहमद

यक़ीन है कि गुमाँ है मुझे नहीं मालूम

अबरार अहमद

क़िस्से से तिरे मेरी कहानी से ज़ियादा

अबरार अहमद

हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है

अबरार अहमद

ज़िंदगी भर जिन्हों ने देखे ख़्वाब

आबिद मुनावरी

हज़ार ता'ने सुनेगा ख़जिल नहीं होगा

आबिद मलिक

गले लगाए मुझे मेरा राज़दाँ हो जाए

आबिद मलिक

श्याम गोकुल न जाना कि राधा का जी अब न बंसी की तानों पे लहराएगा

आबिद हशरी

आज यादों ने अजब रंग बिखेरे दिल में

अब्दुर रऊफ़ उरूज

तुम तो ऐ ख़ुशबू हवाओ उस से मिल कर आ गईं

अब्दुल्लाह कमाल

उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा

अब्दुल्लाह कमाल

अपने होने का इक इक पल तजरबा करते रहे

अब्दुल्लाह कमाल

हिज्र में गुज़री है उस रात की बातें न करो

अब्दुल मतीन नियाज़

मर जाएँगे पिंदार का सौदा न करेंगे

अब्दुल मन्नान तरज़ी

हर आन नई शान है हर लम्हा नया है

अब्दुल मन्नान तरज़ी

अब चराग़ों में ज़िंदगी कम है

अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद

मरहम-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर हो जाए

अब्दुल मजीद हैरत

मरहम ज़ख़्म-ए-जिगर हो जाए

अब्दुल मजीद हैरत

वो बातें तिरी वो फ़साने तिरे

अब्दुल हमीद अदम

सदा किसे दें 'नईमी' किसे दिखाएँ ज़ख़्म

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

दुआ को हाथ मिरा जब कभी उठा होगा

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

यूँ भी दिल अहबाब के हम ने गाहे गाहे रक्खे थे

अब्दुल अहद साज़

सवाल का जवाब था जवाब के सवाल में

अब्दुल अहद साज़

हम अपने ज़ख़्म कुरेदते हैं वो ज़ख़्म पराए धोते थे

अब्दुल अहद साज़

बजा कि लुत्फ़ है दुनिया में शोर करने का

अब्दुल अहद साज़

मोहब्बत एक दम दुख का मुदावा कर नहीं देती

अब्बास ताबिश

सुब्ह की पहली किरन पहली नज़र से पहले

अब्बास ताबिश

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